Sharad Purnima Vrat Katha: शरद पूर्णिमा के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, धन-धान्य से भरा रहेगा घर

Sharad Purnima 2026 Vrat Katha: हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इसे कोजागिरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस साल शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन मां लक्ष्मी के साथ-साथ भगवान कृष्ण की पूजा करने का विधान है। धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसके अलावा, इस दिन चंद्रमा की पूजा करने, स्नान-दान करने और रात में खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा है। इस दिन पूजा के दौरान व्रत कथा पढ़ना जरूरी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की व्रत कथा पढ़ने या सुनने से व्रत का पूरा फल मिलता है। तो आइए, जानते हैं शरद पूर्णिमा व्रत की कथा -

Sharad Purnima Vrat Katha

शरद पूर्णिमा व्रत कथा (Sharad Purnima Vrat Katha In Hindi)

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक गांव में एक साहूकार रहता था। उसकी दो बेटियां थीं। दोनों बहनें पूर्णिमा का व्रत रखती थीं, लेकिन व्रत करने के तरीके में दोनों के बीच अंतर था। बड़ी बहन पूरे श्रद्धा भाव से व्रत करती थी और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलती थी। वहीं, छोटी बहन व्रत को केवल नाम के लिए करती थी और उसे पूरा किए बिना ही व्रत तोड़ देती थी।

समय बीतने के साथ दोनों बहनें बड़ी हो गईं। साहूकार ने दोनों की शादी कर दी। शादी के बाद बड़ी बहन ने स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया, लेकिन छोटी बहन को संतान सुख नहीं मिला। उसके जितने भी बच्चे जन्म लेते, वे जन्म के कुछ समय बाद ही मर जाते थे। इस वजह से छोटी बहन बहुत दुखी रहने लगी।

अपने दुखों का कारण जानने के लिए वह एक दिन संत के पास गई। संत ने उसकी परेशानी सुनी और बताया कि वह पूर्णिमा का व्रत पूरी श्रद्धा और भक्ति से नहीं करती थी। इसी कारण उसे इन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। संत ने उसे सलाह दी कि अगर वह सच्चे मन से शरद पूर्णिमा का व्रत करेगी, तो चंद्रमा की कृपा से उसके दुख दूर हो सकते हैं।

संत की बात मानकर छोटी बहन ने अगली शरद पूर्णिमा पर पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ व्रत किया। इस बार उसे एक संतान की प्राप्ति हुई, लेकिन दुर्भाग्य से जन्म लेते ही उस बच्चे की भी मृत्यु हो गई।

छोटी बहन को विश्वास था कि उसकी बड़ी बहन के पास कोई ऐसा पुण्य है, जिससे वह उसके बच्चे को दोबारा जीवित कर सकती है। इसलिए उसने एक योजना बनाई। उसने अपने मृत बच्चे को कपड़े से ढककर एक छोटी सी चारपाई पर लिटा दिया। इसके बाद उसने अपनी बड़ी बहन को घर बुलाया और उसी चारपाई पर बैठने के लिए कहा।

जब बड़ी बहन चारपाई पर बैठने लगी, तो उसके कपड़े बच्चे को छू गए। तभी बच्चा अचानक जीवित हो गया और रोने लगा। यह देखकर बड़ी बहन हैरान रह गई। उसने छोटी बहन को इस तरह की लापरवाही करने के लिए डांटा।

तब छोटी बहन ने उसे बताया कि उसके बच्चे की जन्म के समय ही मृत्यु हो गई थी, लेकिन बड़ी बहन के स्पर्श से वह फिर से जीवित हो गया। छोटी बहन ने इसे भगवान चंद्रमा की कृपा और शरद पूर्णिमा व्रत का प्रभाव माना। धार्मिक मान्यता के अनुसार, तभी से शरद पूर्णिमा का व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ करने की परंपरा प्रचलित हुई।

Story first published: Sunday, October 25, 2026, 8:00 [IST]
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