कुल्लू दशहरा में नहीं जलता रावण का पुतला, देवलोक से आते हैं देवी-देवता, जानिए क्या है सदियों पुरानी परंपरा

Kullu Dussehra 2026: देश के ज्यादातर हिस्सों में दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाकर त्योहार मनाया जाता है, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में इस दिन एक खास उत्सव शुरू होता है। यहां कुल्लू दशहरा सात दिनों तक चलता है, जिसमें घाटी के अलग-अलग इलाकों से देवी-देवता शामिल होते हैं। इस साल यह मेला 21 से 27 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है। आयोजन के लिए इस बार 347 देवी-देवताओं को बुलाया गया है, जबकि पहले इनकी संख्या 284 दर्ज थी। भगवान रघुनाथ की रथयात्रा, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और पुरानी धार्मिक परंपराएं इस मेले को खास बनाती हैं।

Kullu Dussehra

कुल्लू दशहरे में क्यों नहीं जलाया जाता रावण का पुतला?

देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में यह परंपरा नहीं निभाई जाती। यहां दशहरे की शुरुआत ही विजयादशमी से होती है और पूरा उत्सव भगवान रघुनाथ को समर्पित रहता है। इस दौरान न तो रामलीला का मंचन होता है और न ही रावण का पुतला जलाया जाता है। इसके बजाय भगवान रघुनाथ की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें आसपास के गांवों से आए सैकड़ों देवी-देवता ढालपुर मैदान में एकत्र होते हैं। सात दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसी अनूठी परंपरा के कारण कुल्लू दशहरे को 'देवताओं का महाकुंभ' भी कहा जाता है।

विजयादशमी के दिन से ही क्यों शुरू होता है कुल्लू दशहरा?

कुल्लू दशहरे का इतिहास करीब 400 साल पुराना है। माना जाता है कि इसकी शुरुआत राजा जगत सिंह के समय हुई थी, जिन्होंने 1637 से 1662 तक कुल्लू पर राज किया। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, एक ब्राह्मण के श्राप से छुटकारा पाने के लिए राजा अयोध्या से भगवान रघुनाथ की मूर्ति लेकर आए थे। उन्होंने इस मूर्ति को कुल्लू के सुल्तानपुर में स्थापित कराया। इसके बाद राजा ने भगवान रघुनाथ को अपने राज्य का प्रमुख देवता मान लिया और उनके नाम पर राजकाज चलाने लगे। तभी से कुल्लू दशहरे में भगवान रघुनाथ का विशेष स्थान रहा है। देश के ज्यादातर हिस्सों में दशहरे के दिन रावण दहन के साथ त्योहार खत्म हो जाता है, लेकिन कुल्लू में इसी दिन सात दिन तक चलने वाले मेले की शुरुआत होती है।

पालकियों में सजकर पहुंचते हैं देवी-देवता

कुल्लू दशहरे में घाटी के अलग-अलग इलाकों से देवी-देवताओं का पहुंचना इस मेले की पुरानी परंपरा है। यहां के लोग अपने देवी-देवताओं को जीवंत मानते हैं। मेले के दौरान उन्हें सजी हुई पालकियों और रथों में बैठाकर ढालपुर मैदान लाया जाता है। इस दौरान ढोल-नगाड़ों और तुरहियों की आवाज से पूरा मैदान गूंज उठता है। मनाली, बंजार, आनी, निरमंड, सैंज, गड़सा और मणिकर्ण सहित कुल्लू घाटी के कई क्षेत्रों से देवी-देवता यहां आते हैं। इस परंपरा में सुल्तानपुर पैलेस की भी खास जगह है, जिसे रूपी पैलेस भी कहा जाता है। यहां आने वाले देवी-देवताओं का कुल्लू के पुराने शाही परिवार से भी संबंध रहा है।

माता हिडिंबा का आगमन और रथयात्रा की परंपरा

कुल्लू दशहरे में माता हिडिंबा के आगमन को भी अहम माना जाता है। उन्हें कुल्लू के राजपरिवार की देवी माना जाता है। मेले के दौरान भगवान रघुनाथ की रथयात्रा निकाली जाती है, जो इस उत्सव का मुख्य हिस्सा है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, माता भेखली की ओर से संकेत मिलने के बाद ही रथयात्रा शुरू होती है। इसके बाद सात दिनों तक धार्मिक कार्यक्रम चलते हैं। आखिरी दिन लंका दहन की रस्म निभाई जाती है और फिर भगवान रघुनाथ को वापस उनके मंदिर ले जाया जाता है। कुल्लू दशहरे को साल 2017 में अंतरराष्ट्रीय उत्सव के रूप में पहचान मिली। हालांकि, इससे पहले भी यह मेला अपनी अनोखी परंपराओं और धार्मिक महत्व के कारण देशभर में जाना जाता था।

बिजली महादेव के आने के बाद ही आगे बढ़ती है रथयात्रा

कुल्लू दशहरे में भगवान रघुनाथ की रथयात्रा के दौरान सभी देवी-देवताओं की अपनी-अपनी जगह होती है। इनमें बिजली महादेव की मौजूदगी को भी खास माना जाता है। परंपरा के अनुसार, बिजली महादेव भगवान रघुनाथ के रथ के पीछे बाईं ओर रहते हैं। स्थानीय मान्यता है कि उनके बिना रथयात्रा शुरू नहीं की जाती। रथयात्रा शुरू होने के साथ ही कुल्लू दशहरे के सात दिवसीय मेले की शुरुआत हो जाती है। इन सात दिनों में भगवान रघुनाथ अस्थायी शिविर में विराजमान रहते हैं, जहां श्रद्धालु उनके दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं। उत्सव के आखिरी दिन लंका दहन की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद भगवान रघुनाथ को वापस मंदिर ले जाया जाता है।

Story first published: Wednesday, October 21, 2026, 14:00 [IST]
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