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नरक चतुर्दशी 2026: जब श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर 16,000 राजकुमारियों को दिलाई मुक्ति, जानें पौराणिक कथा
दिवाली से पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी, जिसे रूप चौदस और छोटी दिवाली भी कहते हैं, केवल सजने-संवरने का त्योहार नहीं है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध कर हज़ारों कन्याओं को बंधन से मुक्त कराया था। यह कथा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

कौन था नरकासुर?
पुराणों के अनुसार नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम क्षेत्र) का शक्तिशाली राजा था। कथाओं में उसे भूदेवी (पृथ्वी माता) और भगवान विष्णु के वराह अवतार का पुत्र बताया गया है। उसने कठोर तपस्या से ऐसा वरदान पाया कि उसे केवल उसकी माता के हाथों ही मृत्यु मिल सकती थी। इस वरदान के अहंकार में वह निरंकुश हो गया।
नरकासुर के अत्याचार
शक्ति के मद में नरकासुर ने देवताओं और ऋषि-मुनियों को सताना शुरू कर दिया। कथा के अनुसार उसने देवमाता अदिति के कुंडल छीन लिए और इंद्र के छत्र पर अधिकार कर लिया। सबसे बड़ा अपराध यह था कि उसने पृथ्वी के अनेक राज्यों से 16,000 कन्याओं और राजकुमारियों को बंदी बनाकर अपने महल में कैद कर लिया। चारों ओर हाहाकार मच गया।
श्रीकृष्ण का युद्ध और सत्यभामा की भूमिका
पीड़ित देवता और लोग भगवान श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचे। श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। मान्यता है कि सत्यभामा को भूदेवी का अंश माना जाता है। युद्ध में नरकासुर के बाणों से श्रीकृष्ण मूर्छित हो गए, तब सत्यभामा ने धनुष उठाकर युद्ध संभाला। अंत में उन्हीं के हाथों नरकासुर का वध हुआ, और इस प्रकार उसके वरदान की मर्यादा भी पूरी हुई।
16,000 कन्याओं की मुक्ति
नरकासुर के अंत के बाद श्रीकृष्ण ने सभी बंदी कन्याओं को मुक्त कराया। लेकिन समाज में उनके सम्मान को लेकर संकट था, क्योंकि लंबे समय तक कैद में रहने के कारण उन्हें लौटने पर स्वीकार किए जाने की आशा कम थी। कथा के अनुसार, उन कन्याओं ने श्रीकृष्ण से ही सहारा माँगा, और उन्हें सम्मान देने के लिए श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनाया और उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाया। यह प्रसंग उनकी करुणा और नारी-सम्मान का उदाहरण माना जाता है।
नरक चतुर्दशी और रूप चौदस की परंपराएं
कथा के अनुसार नरकासुर के वध के बाद लोगों ने दीप जलाकर खुशियां मनाईं। इसी कारण इस दिन से दीपोत्सव का आरंभ माना जाता है। अभ्यंग स्नान: सूर्योदय से पहले उबटन और तेल लगाकर स्नान करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे पाप और दरिद्रता दूर होती है।



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