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Jagannath Rath Yatra 2026: 16 या 17 जुलाई कब से शुरू होगी जगन्नाथ रथ यात्रा? जानें इसका धार्मिक महत्व?
Jagannath Rath Yatra 2026 Kab Se Hogi Shuru: ओडिशा के पुरी में भव्य जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू होने वाली है। ये रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अगाध आस्था, भक्ति और अलौकिक शक्ति का महाकुंभ है। हर साल की तरह इस बार भी देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ की एक झलक पाने के लिए पुरी धाम पहुंचने लगे हैं। 9 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व को रथ त्योहार या श्री गुंडीचा यात्रा भी कहा जाता है, जहां भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा के साथ विशालकाय रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं। क्योंकि इस साल तिथियों को लेकर थोड़ा असमंजस है, इसलिए हर भक्त के मन में यही सवाल है कि जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होगी या 17 जुलाई से? आइए जान लें रथ यात्रा की सही तारीख और इस खास पर्व का धार्मिक महत्व।

16 या 17 जुलाई: कब से शुरू होगी जगन्नाथ रथ यात्रा 2026?
हिंदू पंचांग के अनुसार, जगन्नाथ रथ यात्रा हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को बेहद धूमधाम के साथ निकाली जाती है। साल 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार से शुरू होने जा रही है और 24 जुलाई 2026 को इसका समापन होगा। 24 जुलाई के दिन बहुदा यात्रा यानी भगवान की मुख्य मंदिर में वापसी होगी। यह रथ यात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर 3 किलोमीटर दूर स्थित गुंडीचा मंदिर तक जाती है। गुंडीचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है, जहां तीनों भाई-बहन 7 दिनों तक विश्राम करते हैं और एकादशी तिथि पर वापस मुख्य मंदिर लौटते हैं।
क्या है जगन्नाथ रथ यात्रा का धार्मिर महत्व?
हिंदू धर्म की मान्यताओं में जगन्नाथ रथ यात्रा का स्थान बेहद सर्वोच्च है। माना जाता है कि जो भी श्रद्धालु रथ पर सवार भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ के दर्शन करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ये भी कहा जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे भक्ति भाव के साथ इन विशाल रथों की डोर थामता है और उसे खींचता है, उसे अक्षय पुण्य मिलता है। यह अवसर साल में सिर्फ एक बार आता है जब स्वयं भगवान अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर भक्तों को दर्शन देने सड़क पर आते हैं।

क्या आप जानते हैं भव्य रथों की खासियत
इस यात्रा में तीन अलग-अलग रथ होते हैं, जिन्हें नीम की पवित्र लकड़ियों से बिना किसी कील या लोहे के इस्तेमाल के बनाया जाता है:
नंदीघोष: भगवान जगन्नाथ का रथ (लाल और पीले रंग का)।
तालध्वज: भाई बलभद्र का रथ (लाल और हरे रंग का)।
दर्पदलन: बहन सुभद्रा का रथ (लाल और काले रंग का)।
जगन्नाथ रथ यात्रा का अनोखा इतिहास जानें जब बीमार पड़ते हैं भगवान
इस विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के पीछे एक बेहद दिलचस्प पौराणिक इतिहास और परंपरा जुड़ी है, जो इसे दुनिया के अन्य सभी त्योहारों से अलग बनाती है। इनके बारे में नीचे प्वाइंट्स में बताया गया है।
1. शाही स्नान और प्रभु की बीमारी:
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्मदिन मनाया जाता है। इस खास दिन पर प्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा को उनके रत्न सिंहासन से उतार कर स्नान मंडप में लाया जाता है। यहाँ उन्हें 108 कलशों के सुगंधित जल से शाही स्नान कराया जाता है।
2. 15 दिनों का एकांतवास (अनासर काल):
मान्यता है कि इस भारी स्नान के कारण प्रभु बीमार हो जाते हैं और उन्हें तेज बुखार आ जाता है। इसके बाद अगले 15 दिनों तक भगवान को एक विशेष कक्ष में रखा जाता है, जिसे 'अनासर घर' कहते हैं। इस दौरान मंदिर के मुख्य वैद्यों और चुनिंदा सेवकों के अलावा किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं होती। इन 15 दिनों तक भक्त भगवान के दर्शन नहीं कर पाते हैं।
3. 'छेरा पहरा' की पावन रस्म:
जब भगवान पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं, तो आषाढ़ द्वितीया के दिन यात्रा शुरू होती है। रथ रवानगी से पहले पुरी के गजपति राजा स्वयं सोने की झाड़ू से रथों के मंडप और मार्ग को साफ करते हैं। इस रस्म को 'छेरा पहरा' कहा जाता है, जो यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब एक समान हैं। इसके बाद ही रथ खींचने की प्रक्रिया शुरू होती है।
रथ यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों और मार्ग की सफाई करते हैं। इस परंपरा को छेरा पहरा कहा जाता है।
गुंडीचा मंदिर में सात दिन प्रवास के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मुख्य मंदिर में वापसी को बहुदा यात्रा कहा जाता है।



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