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पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए नियमनुसार पिंडदान और तर्पण किया जाता है। कहते हैं पितृपक्ष में पूर्वजों का धरती पर आगमन होता है। यदि इस दौरान पूरी श्रद्धा के साथ पिंडदान और तर्पण किया जाता है तो इससे पूर्वज प्रसन्न होते हैं और अपने परिजनों को खुशहाल और स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद देते हैं। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से पितृपक्ष शुरू हो जाता है जो 15 दिनों तक चलता है। इस बार पितृपक्ष 10 सिंतबर को शुरू होकर 25 सितंबर को समाप्त होगा। इन दिनों कई ऐसे नियम होते हैं जिनका पालन करना जरूरी होता।
आइए जानते हैं श्राद्ध की सारी तिथियों के बारे में, साथ ही हम आपको पितृपक्ष का महत्व भी बताएंगे।

श्राद्ध की तिथियां
10 सितंबर, शनिवार, पूर्णिमा का श्राद्ध एवं तर्पण
11 सितंबर, रविवार, प्रतिपदा का श्राद्ध एवं तर्पण
12 सितम्बर, सोमवार, द्वितीया का श्राद्ध एवं तर्पण
13 सितंबर, मंगलवार, तृतीया का श्राद्ध एवं तर्पण
14 सितंबर, बुधवार, चतुर्थी का श्राद्ध एवं तर्पण
15 सितंबर, गुरुवार, पंचमी का श्राद्ध एवं तर्पण
16 सितंबर, शुक्रवार, षष्ठी का श्राद्ध एवं तर्पण
17 सितंबर, शनिवार, सप्तमी का श्राद्ध एवं तर्पण
18 सितंबर, रविवार, अष्टमी का श्राद्ध एवं तर्पण
19 सितंबर, सोमवार, नवमी का श्राद्ध एवं तर्पण
20 सितंबर, मंगलवार, दशमी का श्राद्ध एवं तर्पण
21 सितंबर, बुधवार, एकादशी का श्राद्ध तर्पण
22 सितंबर, गुरुवार, द्वादशी का श्राद्ध एवं तर्पण
23 सितंबर, शुक्रवार, त्रयोदशी का श्राद्ध एवं तर्पण
24 सितंबर, शनिवार, चतुर्दशी का श्राद्ध एवं तर्पण
25 सितंबर, रविवार, अमावस्या का श्राद्ध एवं तर्पण

पित्र पक्ष का महत्व
हिंदू धर्म में पितृपक्ष का बड़ा ही महत्व होता है। माना जाता है कि पितृपक्ष में पूरे 15 दिनों तक हमारे पूर्वज धरती पर हमारे आस पास ही रहते हैं। यदि इस दौरान नियमनुसार श्राद्ध कर्म किया जाए तो पितरों को मुक्ति मिलती है, साथ ही उनके आशीर्वाद से उनका पूरा परिवार सुखी रहता है।



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