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Ambubachi Mela 2026: कामाख्या मंदिर में शुरू हुआ अंबुबाची मेला, 3 दिनों तक बंद रहेंगे कपाट, जानें इसका महत्व
Ambubachi Mela 2026: भारत अपनी विविध संस्कृतियों, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। देश में कई ऐसे पर्व और मेले मनाए जाते हैं, जिनकी अपनी अलग पहचान है। इन्हीं में से एक है अंबुबाची मेला, जो असम के गुवाहाटी स्थित कामाख्या देवी मंदिर में हर साल आयोजित किया जाता है। 51 शक्तिपीठों में शामिल यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि यहां माता सती की योनि गिरी थी, इसलिए यह शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। अंबुबाची मेला अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं और विशेष प्रसाद के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध है।

अंबुबाची मेला 2026 कब से शुरू?
इस साल अंबुबाची मेला 22 जून 2026 यानी आज से शुरू होने वाला है। मंदिर प्रशासन ने बताया कि 22 जून को रात 9 बजकर 8 मिनट 42 सेकंड पर 'प्रवृत्ति' अनुष्ठान के साथ मेले की शुरुआत होगी। इसी के साथ मां कामाख्या के वार्षिक रजस्वला (मासिक धर्म) काल की शुरुआत मानी जाएगी।
तीन दिनों तक बंद रहेंगे मंदिर के कपाट
अनुष्ठान शुरू होने के बाद तीन दिनों तक मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और चौथे दिन विशेष पूजा, स्नान तथा श्रृंगार के बाद गर्भगृह के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। कपाट खुलते ही बड़ी संख्या में भक्त देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
माता के रजस्वला काल से जुड़ा है अंबुबाची मेला
कामाख्या देवी मंदिर की सबसे अनोखी मान्यता यह है कि यहां देवी के वार्षिक रजस्वला (मासिक धर्म) काल को शक्ति और सृजन का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है। मान्यता के अनुसार अंबुबाची पर्व के दौरान मां कामाख्या तीन दिनों तक रजस्वला रहती हैं। इस अवधि में मंदिर का गर्भगृह श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया जाता है और नियमित पूजा-अर्चना भी स्थगित रहती है। यही कारण है कि अंबुबाची मेले को देवी शक्ति और प्रकृति के सृजन चक्र से जुड़ा विशेष उत्सव माना जाता है।
प्रसाद की अनोखी परंपरा
अंबुबाची मेले की एक विशेष परंपरा प्रसाद से भी जुड़ी है। मान्यता है कि रजस्वला काल के दौरान गर्भगृह में एक सफेद वस्त्र रखा जाता है। कपाट खुलने के बाद इसी वस्त्र के छोटे-छोटे टुकड़े श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप वितरित किए जाते हैं। इसे 'अंबुबाची वस्त्र' कहा जाता है। भक्त इसे देवी का आशीर्वाद मानकर अपने पास रखते हैं।
ब्रह्मपुत्र नदी को लेकर प्रचलित है यह मान्यता
अंबुबाची मेले के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी के जल के लाल रंग का हो जाने की मान्यता भी काफी प्रसिद्ध है। लोक मान्यताओं के अनुसार, यह घटना देवी के रजस्वला काल से जुड़ी मानी जाती है। हालांकि, इस संबंध में वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टिकोण अलग-अलग हैं, लेकिन श्रद्धालुओं के बीच यह मान्यता आज भी विशेष आस्था का विषय बनी हुई है।
क्यों खास है अंबुबाची मेला?
अंबुबाची मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति, सृजन और प्रकृति के सम्मान का प्रतीक भी माना जाता है। यही वजह है कि हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु, साधु-संत और तांत्रिक इस मेले में शामिल होने के लिए कामाख्या मंदिर पहुंचते हैं।
तांत्रिक साधना का प्रमुख केंद्र
अंबुबाची मेले के दौरान देश-विदेश से हजारों साधु, संत और तांत्रिक कामाख्या धाम पहुंचते हैं। यह पर्व तांत्रिक परंपरा का सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है, इसलिए इसे पूर्वोत्तर भारत का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उत्सव भी कहा जाता है।
देवी की कोई प्रतिमा नहीं है
कामाख्या मंदिर की एक अनोखी विशेषता यह है कि यहां मां कामाख्या की पारंपरिक मूर्ति नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक शिला स्वरूप की पूजा की जाती है, जिसे देवी की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
मेले में पहुंचते हैं लाखों श्रद्धालु
अंबुबाची मेले में हर साल देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु, साधु-संत और श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। इस दौरान गुवाहाटी और नीलांचल पहाड़ी क्षेत्र में विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं।



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