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क्या 1876 जैसी तबाही फिर होगी? 150 साल बाद लौट सकता है विनाशकारी अल नीनो! सूखा और अकाल का खतरा
Super El Niño Alert: एक बार फिर विश्व में खतरनाक जल संकट, सूखा और अकाल की संभावना बढ़ती नजर आ रही है। अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने संकेत दिए हैं कि 2026 का सुपर अल नीनो हाल के इतिहास की सबसे शक्तिशाली जलवायु घटनाओं में शामिल हो सकता है। कभी जरूरत से ज्यादा बारिश हो रही है तो कभी जला देने वाली गर्मी। विशेषज्ञों के अनुसार इसके कारण दुनिया के कई हिस्सों में सूखा, बाढ़, भीषण गर्मी और खाद्य संकट का खतरा बढ़ सकता है। भारत में भी इसका असर मानसून और कृषि पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। आइए जानते हैं क्या है सुपर अल नीनो और क्यों बढ़ रही है वैज्ञानिकों की चिंता।

NOAA की चेतावनी से बढ़ी दुनिया की चिंता
अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (National Oceanic and Atmospheric Administration) (NOAA) के ताजा बुलेटिन के अनुसार अक्टूबर से दिसंबर 2026 के बीच बेहद शक्तिशाली अल नीनो बनने की 81% संभावना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पिछले कई दशकों की सबसे मजबूत जलवायु घटनाओं में शामिल हो सकता है और इसका असर 2027 की शुरुआत तक बना रह सकता है।
क्या 150 साल पहले जैसी तबाही दोहराएगा सुपर अल नीनो?
विशेषज्ञ 2026 के अल नीनो की तुलना 1876-78 की ऐतिहासिक घटना से कर रहे हैं। उस दौरान एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में भीषण सूखा, अकाल और फसलों की भारी तबाही देखने को मिली थी। हालांकि आज मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन पहले से कहीं बेहतर है, फिर भी वैज्ञानिक इसे गंभीर चेतावनी मान रहे हैं।

क्या होता है सुपर अल नीनो?
अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ जाता है और ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ जाती हैं, तो इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। यदि यह प्रभाव बहुत अधिक तीव्र हो जाए तो इसे सुपर अल नीनो कहा जाता है।

सुपर अल नीनो से क्या-क्या हो सकते हैं नुकसान?
सुपर अल नीनो के दौरान कई देशों में भीषण सूखा, कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़, लंबे समय तक हीटवेव, जंगलों में आग, कृषि उत्पादन में गिरावट, जल संकट और खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
सुपर अल नीनो का भारत पर कितना पड़ेगा असर?
भारत में अल नीनो का सबसे बड़ा असर मानसून पर पड़ता है। कई बार इसके कारण सामान्य से कम बारिश होती है, जिससे खेती, जलाशयों और पीने के पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि हर अल नीनो का प्रभाव समान नहीं होता और इसका असर क्षेत्र और मौसम की अन्य परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल सभी संकेतों पर लगातार नजर रखी जा रही है। आने वाले महीनों में समुद्र की सतह का तापमान और वायुमंडलीय बदलाव तय करेंगे कि यह अल नीनो कितना शक्तिशाली होगा। इसलिए अभी घबराने की बजाय आधिकारिक मौसम एजेंसियों की सलाह और अपडेट पर भरोसा करना सबसे उचित रहेगा।



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