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Jagannath Rath Yatra 2026: क्यों निकाली जाती है भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा? जानें कैसे शुरू हुई यह परंपरा
Jagannath Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भारत के सबसे प्राचीन और भव्य धार्मिक उत्सवों में गिनी जाती है। यह यात्रा हर साल आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर निकाली जाती है। इस दिन पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों पर विराजमान होकर गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं। लाखों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होकर भगवान के रथ की रस्सी खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस यात्रा को भगवान के अपने भक्तों के प्रति प्रेम और करुणा का प्रतीक बताया है। वहीं, स्कंद पुराण, पद्म पुराण और नारद पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में भी इस यात्रा का उल्लेख मिलता है। रथ यात्रा की शुरुआत को लेकर कई पौराणिक और लोक मान्यताएं प्रचलित हैं।

पहली कथा
स्कंद पुराण के उत्कल खंड में रथ यात्रा की उत्पत्ति से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा मिलती है। मान्यता है कि मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने पुरी में भगवान जगन्नाथ का भव्य मंदिर बनवाकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं की स्थापना कराई। स्थापना के बाद दिव्य आकाशवाणी हुई कि भगवान समय-समय पर अपने भक्तों के बीच जाकर उन्हें दर्शन देना चाहते हैं। इसी दिव्य संदेश को स्मरण रखने के लिए भगवान को रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण कराने की परंपरा शुरू हुई, जो आगे चलकर जगन्नाथ रथ यात्रा के रूप में प्रसिद्ध हो गई।
दूसरी कथा
एक अन्य मान्यता भगवान श्रीकृष्ण के वृंदावन आगमन से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण राधा रानी और ब्रजवासियों से मिलने वृंदावन पहुंचे, तब गोप-गोपियों ने प्रेम और उत्साह से उनका स्वागत किया। उन्होंने स्वयं भगवान के रथ की रस्सियां पकड़कर पूरे नगर में भ्रमण कराया। धार्मिक मान्यता है कि पुरी की रथ यात्रा उसी प्रेम, भक्ति और भगवान के भक्तों के साथ उनके आत्मीय संबंध की याद दिलाती है। कुछ मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि श्रीकृष्ण को संपूर्ण जगत का स्वामी मानकर उन्हें 'जगन्नाथ' नाम से संबोधित किया गया।
तीसरी कथा
रथ यात्रा से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा द्वापर युग के अंत की मानी जाती है। कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के देह त्याग के बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया, लेकिन तेज आंधी और समुद्र की लहरों के कारण उनका एक दिव्य अवशेष पुरी के समुद्र तट तक पहुंच गया। पुरी के राजा ने उसे अत्यंत श्रद्धा के साथ रथ पर रखकर नगर भ्रमण कराया। बाद में समुद्र से प्राप्त पवित्र दारु (दिव्य लकड़ी) से एक विशेष पात्र तैयार कर उस अवशेष को सम्मानपूर्वक स्थापित किया गया। लोक मान्यताओं के अनुसार, इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है।
क्यों निकाली जाती है भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, रथ यात्रा का सबसे बड़ा उद्देश्य भगवान को उनके भक्तों के बीच लाना है। प्राचीन समय में हर व्यक्ति को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने का अवसर नहीं मिलता था। इसलिए भगवान जगन्नाथ स्वयं रथ पर विराजमान होकर बाहर आते हैं, ताकि जाति, वर्ग और सामाजिक भेदभाव से परे हर श्रद्धालु उनके दर्शन कर सके। यही कारण है कि रथ यात्रा को समानता, सेवा, भक्ति और लोककल्याण का प्रतीक भी माना जाता है।
पहली बार कब निकली थी रथ यात्रा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पुरी में भगवान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण राजा इंद्रद्युम्न ने कराया था। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं की स्थापना के बाद उन्होंने पहली बार भगवान की रथ यात्रा का आयोजन करवाया। तभी से आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देने निकलते हैं और यह परंपरा आज भी पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है।
भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां अधूरी क्यों दिखाई देती हैं?
भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की अनोखी प्रतिमाओं को लेकर भी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता है कि राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप के दर्शन हुए थे। इसके बाद उन्होंने उसी रूप में भगवान की प्रतिमा बनवाने का निश्चय किया। कुछ समय बाद समुद्र तट पर एक पवित्र दारु (दिव्य लकड़ी) मिली, जिसे प्रतिमा निर्माण के लिए उपयुक्त माना गया। कथा के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध शिल्पकार का रूप धारण कर राजा के पास पहुंचे। उन्होंने प्रतिमाएं बनाने की जिम्मेदारी स्वीकार की, लेकिन शर्त रखी कि जब तक उनका कार्य पूरा न हो जाए, तब तक कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा। राजा ने यह शर्त मान ली और वे बंद कक्ष में प्रतिमाओं का निर्माण करने लगे। कई दिनों तक भीतर से कोई आवाज नहीं आने पर राजा और रानी चिंतित हो गए। आखिरकार उन्होंने दरवाजा खुलवा दिया। दरवाजा खुलते ही वृद्ध शिल्पकार वहां नहीं थे, जबकि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं अधूरे स्वरूप में दिखाई दीं। धार्मिक मान्यता है कि राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर उन्हीं प्रतिमाओं को विधि-विधान से स्थापित कर दिया। तभी से पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में भगवान का यही विशिष्ट स्वरूप श्रद्धापूर्वक पूजित है।



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