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बसंत पंचमी: सरस्वती मां ही नहीं, इस दिन कामदेव की भी होती है पूजा
लोहड़ी और मकर संक्रांति के बाद बसंत पंचमी के त्योहार में भी कुछ दिन ही बचे है। माना जाता है कि बसंत पंचमी के साथ ही सर्दी का मौसम जाने लगता है। बसंत ऋतु के आगमन और फसल की शुरूआत होने के रूप बसंत पचंमी का त्योहार मनाया जाता है।
इस साल बसंत पचंमी का त्योहार 22 जनवरी को मनाया जाएगा। बसंत पंचमी को 'सरस्वती पूजा' के रूप में भी मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर शिक्षा के हर क्षेत्र और संगीत से जुड़े विद्यार्थी मां सरस्वती की पूजा करते हैं क्योंकि हाथ में वीणा धारण किए हुए देवी सरस्वती को संगीत और कला की देवी भी माना जाता है।

तिथि और मूहर्त
पंचाग के अनुसार बसंत पंचमी माघ महीने की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक इस बार यह त्योहार 22 जनवरी को मनाया जाएगा, इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 17 मिनट से दोपहर 12 बजकर 32 मिनट तक है।

इस दिन हुआ मां सरस्वती का जन्म
हिंदू मान्यताओ के अनुसार इस दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा ने जीव-जंतुओं और मनुष्य योनि की रचना की तो उन्हें लगा कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर सन्नाटा छाया रहता है। ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे चार हाथों वाली एक सुंदर स्त्री प्रकट हुईं! उस स्त्री के एक हाथ में वीणा और दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। बाकि दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया. जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी मिल गई। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। ब्रह्मा ने देवी सरस्वती की उत्पत्ती बसंत पंचमी के दिन ही की थी। इसलिए हर साल बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्म दिन मनाया जाता है।

पीले रंग का महत्व
इस दिन लोग पीले रंग के कपड़े पहनते है, पतंग उड़ाते है और मीठे पीले रंग के चावल का सेवन करते है। पीले रंग को बसंत का प्रतीक मानते है। बंसत ऋतु को सभी मौसमों में बड़ा माना जाता है। इस मौसम में न तो चिलचिलाती धूप होती है, न सर्दी और न ही बारीश, वसंत में पेड़-पौधों पर ताजे फल और फूल खिलते हैं। चारो तरफ देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे प्रकृति ने धानी रंग की चुनरी ओढ़ ली है।

पीले फूल ही चढ़ाए जाते है
इस मौके पर देवी को पीले फूल और पीली मिठाई का भोग लगाया जाता है। साथ ही इस दिन आमतौर पर लोगों के घरों में केसर हलवा और मीठे चावल बनाएं जाते हैं।इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। इस दिन पीले चावल या पीले रंग का भोजन किया जाता है। बंगाल में इस दिन पीले रंग की खिचड़ी खाई जाती है। इस दिन लोग चावलों में गुड़ को मिलाकर मिठ्ठी खिचड़ी भी खाते हैं।

कामदेव की पूजा.
यह ऋतु सेहत की दृष्टि से भी बहुत अच्छी मानी जाती है। मनुष्यों के साथ पशु-पक्षियों में नई चेतना का संचार होता है। बसंत को प्रेम के देवता कामदेव का मित्र माना जाता है। इस ऋतु को काम बाण के लिए अनुकूल माना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। पवित्र नदियों के तट और तीर्थ स्थानों पर बसंत मेला भी लगता है।

प्रेम की ऋतु भी माना जाता है..
बसंत पंचमी के दिन कुछ लोग कामदेव की पूजा भी करते हैं। पुराने जमाने में राजा हाथी पर बैठकर नगर का भ्रमण करते हुए देवालय पहुंचकर कामदेव की पूजा करते थे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बसंत कामदेव के मित्र हैं, इसलिए कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ है। जब कामदेव कमान से तीर छोड़ते हैं तो उसकी आवाज नहीं होती है। इसलिए इस दिन फूलों को प्रेम और प्रकृति से जोड़कर भी देखा जाता है। इस दिन रति की भी पूजा की जाती है।



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