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IPL खेलने से पहले धोनी ने की दिउड़ी मंदिर में पूजा, जानें इस मंदिर से जुड़ी मान्यता और खासियत
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी चेन्नई पहुंच चुके हैं जहां वो जल्द ही शुरू होने वाले इंडियन प्रीमियर लीग में हिस्सा लेंगे। चेन्नई रवाना होने से पहले धोनी ने रांची में स्थित दिउड़ी मंदिर में पूजा की। उन्होंने वहां दोपहर की आरती में हिस्सा लिया।

रांची से 70 किलोमीटर दूर तमाड़ प्रखंड में स्थित दिउड़ी मंदिर में मां दुर्गा के सोलहभुजी रूप की पूजा होती है। जानते हैं रांची के इस दिउड़ी मंदिर की खासियत जिसकी वजह से कई मीलों का सफर तय करके भक्त पहुंचते हैं।

धोनी पहले भी आ चुके हैं इस मंदिर में
ये पहला मौका नहीं है जब चेन्नई सुपरकिंग्स के कप्तान धोनी दिउड़ी मंदिर में दर्शन के लिए आए हों। इससे पहले भी वो कई बार यहां पूजा करने के लिए पहुंचे हैं। इससे पता चलता है कि इस मंदिर के प्रति उनकी आस्था कितनी ज्यादा है। धोनी के परिवार के दूसरे सदस्य भी यहां पूजा के लिए आते हैं।

इस मंदिर के गर्भगृह में है मां की सोलहभुजी प्रतिमा
दिउड़ी मंदिर के गर्भगृह में मां की सोलह भुजाओं वाली प्रतिमा मौजूद है। इस मूर्ति की ऊंचाई लगभग साढ़े तीन फीट है जो काले रंग के प्रस्तर खंड पर उत्कीर्ण है। माता की प्रतिमा के बाएं हाथों में धनुष, ढाल, फूल, परम है। वहीं अन्य चार हाथों में आयुध क्षतिग्रस्त होने का कारण स्पष्ट नहीं हैं। मां के दाएं हाथ में तलवार, तीर, डमरू, गदा, शंख, त्रिशूल आदि हैं। माता की मूर्ति बाजूबंद, कमरधनी, बाली आदि आभूषणों से सजी हुई है।

इस मंदिर में हैं दो पुजारी
देश के दूसरे मंदिरों की तुलना में इस मंदिर की अलग मान्यताएं और खासियत भी हैं। यहां आपको पुजारी की भूमिका में आदिवासी पाहन और ब्राह्मण दोनों मिलेंगे।

मंदिर के निर्माण से जुड़ी हैं कई कथाएं
इस मंदिर के निर्माण को लेकर कई सदियों से बहस जारी है मगर इसका निर्माण कब, किसने और क्यों करवाया इस पर एक राय नहीं बन पायी है। एक कथा के अनुसार माना जाता है कि सिंहभूम के केरा के राजा अपने दुश्मनों से जंग हारने के बाद दिउड़ी पहुंचे थे। वो अपने साथ देवी मां की मूर्ति भी लेकर आए और उसे वेणु वन में जमीन के अंदर छिपा दिया था। उसके कुछ दिनों बाद वहां मंदिर का निर्माण किया गया और प्रतिमा स्थापित की गयी।
दूसरी कथा के अनुसार ओडिशा के चमरू पंडा वर्ष में दो बार तमाड़ के राजा को तसर बेचने के लिए आते थे। अपनी मौजूदगी में वो राजा के यहां पूजा-पाठ भी करा दिया करते थे। राजा ने उन्हें वहीं बस जाने के लिए मना लिया। उन्होंने राजा की बात मानकर जंगल में तपस्या करना आरम्भ कर दिया और इस दौरान उन्हें लगा कि मां उनसे भेंट करना चाहती हैं। उन्होंने ये बात राजा को बताई। तमाड़ के राजा ने जंगल की सफाई शुरू करवाई। इस दौरान काले रंग का पत्थर दिखा। सभी मजदूर शाम होने के कारण थककर वापस लौट गए। जब वे दूसरे दिन लौटे तब उन्हें वहां एक मंदिर खड़ा दिखाई दिया।
वहीं कुछ लोग इस मंदिर के निर्माण को सम्राट अशोक से जोड़कर देखते हैं। तीसरी कथा के अनुसार कलिंग अभियान के दौरान सम्राट अशोक ने इसका निर्माण करवाया था।

नवरात्रि पर पहुंचती है भक्तों की भारी भीड़
दिउड़ी मंदिर आस्था और विश्वास का अजब संगम है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर भले ही लोगों के मत अलग अलग हों लेकिन मां के दर पर आकर आशीर्वाद पाना ही उनका सबसे बड़ा उद्देश्य है। यहां हर साल नवरात्रि के मौके पर खास मेला लगता है। इस मंदिर में हजारों की संख्यां में भक्त मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा दशहरे के दिन इस मंदिर में बलि देने की प्रथा है जो सदियों से चली आ रही है।



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