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जानें किन लोगों के कारण हुआ कुरुक्षेत्र का युद्ध
कुछ लोगों के लिए महाभारत केवल एक मिथक या महर्षि व्यास की कल्पना मात्र नहीं है। बल्कि यह एक इतिहास है और उनके अनुसार महाभारत के पात्रों ने किसी समय वास्तव में पृथ्वी पर जन्म लिया था।
यह इतिहास हो या ना हो लेकिन महाभारत का युद्ध इतिहास का सबसे भयानक युद्ध था। केवल इसलिए नहीं कि यह लंबा चला और इसमें इतने सारे लोगों ने भाग लिया बल्कि इसके पीछे छिपे रहस्यों और गूढ़ बातों के कारण।
कुरुक्षेत्र का युद्ध क्यों हुआ, इसका कोई एक जवाब नहीं है। यह युद्ध इसके पात्रों की बदले की भावना, लालच, लोभ, ईर्ष्या, महत्वाकांक्षा और वासना आदि का संयुक्त परिणाम था।
यह भी कहा जा सकता है कि यह युद्ध दुर्योधन के अनैतिक कार्यों की बजाय पितामह भीष्म जैसे सम्माननीय और ज्ञाता व्यक्ति के चुप रहने और सही समय पर सही कदम नहीं उठाने का परिणाम था।
यहाँ, हम आपको कुरुक्षेत्र के युद्ध के लिए जिम्मेदार कारण बता रहे हैं।

शांतनु और सत्यवती
इस युद्ध के बीज कौरव और पांडवों के जन्म से बहुत पहले ही बोये जा चुके थे। शांतनु की वासना और सत्यवती के लालच और महत्वाकांक्षा ने देववृत भीष्म को सिंहासन से दूर रखा। यदि भीष्म शांतनु पर विजय पा लेते तो शायद यह युद्ध रोका जा सकता था।

भीष्म
भीष्म के द्वारा ली गई सौगंध के कारण उन्हें हस्तिनापुर के सिंहासन के सेवक की भांति रहना पड़ा। उनका दृढ़ता से ज़िम्मेदारी निभाना और अपने भाइयों और उनके बच्चों के प्रति प्यार के कारण वे भूल गए कि क्या सही है और क्या गलत। उन्होने गांधारी को अंधे धृतराष्ट्र से विवाह करने को मजबूर किया जिससे उसका भाई शकुनि खासा नाराज हुआ। जब शकुनि के बहकावे में आकार कौरवों ने चौपड़ (पासों का खेल) खेला और द्रौपदी की बेइज्जती हुई तो भी वे चुप रहे। दुर्योधन को विश्वास था कि यदि पितामह भीष्म उनकी तरफ रहेंगे तो उनकी विजय निश्चित है, यह भी भीष्म को युद्ध के लिए जिम्मेदार बनाता है। अंत में कृष्ण को उन्हें अपनी कसम ना तोड़ने के व्यामोह को छोडने के लिए धमकाना पड़ा। इससे पता चलता है हर समय चुप्पी साधे रखना सही नहीं है।

धृतराष्ट्र और गांधारी
धृतराष्ट्र न केवल आँखों से अंधे थे बल्कि वे अपने पुत्रों के प्रेम में भी अंधे थे। उन्होने अपने पुत्रों के अत्याचारों पर ध्यान नहीं दिया और उनकी हर गलती पर उनका पक्ष लिया। गांधारी ने भी अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली थी। उसे पता था कि उसका भाई शकुनि उसके पुत्रों को गलत राह पर ले जा रहा है लेकिन उसने कुछ नहीं किया।

युधिष्टिर
उन्हें धर्मराज कहा गया जो कि सही का पक्ष लेता है, लेकिन अपनी कमजोरी के कारण वह भी युद्ध का कारण बना। वह पासे खेलने से मना कर सकता था। अगर खेल भी लिया तो उन्हें अपने भाइयों और द्रौपदी को दाव पर लगाने की क्या जरूरत थी। हालांकि वे धर्म के पुजारी थे लेकिन फिर भी उनका यह कदम सही नहीं था। यदि वे इस खेल में भाग लेने से मना कर देते तो युद्ध होता ही नहीं।

द्रौपदी
यह कहा गया है कि द्रौपदी भी महाभारत के युद्ध के लिए जिम्मेदार थी। उसने इंद्रप्रस्थ में दुर्योधन के अंधे पिता के बारे में जो टिप्पणी की उससे दुर्योधन को शर्मिंदगी महसूस हुई और उसे बहुत बुरा लगा। इससे दुर्योधन ने भी उसको सबक सिखाने की ठानी और द्रौपदी को आखिरकार भरी सभा में बेइज्जत होना पड़ा।

शकुनि
कृष्ण के बाद जिस व्यक्ति ने महाभारत को प्रभावित किया वो है शकुनि। वह नाराज था क्यों कि भीष्म ने उसकी बहन का विवाह अंधे धृतराष्ट्र से करवा दिया था। इसलिए वह बदला लेना चाहता था और हस्तिनापुर को पूरी तरह बर्बाद करना चाहता था। इसलिए उसने अपने लक्ष्य में कामयाबी हांसिल करने के लिए अपने भांजों को भड़काना शुरू कर दिया। वह एक बहुत बड़ा षडयंत्रकारी था जो कि महाभारत का एक बहुत बड़ा कारण बना।

कर्ण
वह महाभारत का सबसे बड़ा धर्मी पुरुष था। जन्म से ही माँ के द्वारा त्याग किए जाने पर और एक सारथी के पुत्र के रूप में बड़े होने के कारण वह हमेशा समानता, न्याय और प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहता था। उसे कभी न्याय नहीं मिला और दुर्योधन ने उसे अपना दोस्त बनाया और समानता दी। कर्ण दुर्योधन का ऋणी था और दुर्योधन का मित्र होने के बावजूद उसने दुर्योधन को कभी गलत कामों से नहीं रोका। वह अपने आपको अर्जुन से बेहतर साबित करना चाहता था। वो वह सब नाम और प्रसिद्धि हांसिल करना चाहता था जो जिंदगी ने उससे छीन ली थी। और यह युद्ध से ही हांसिल हो सकता था। वह केवल अपने मित्र की मदद करने के लिए युद्ध में नहीं गया था बल्कि उसका खुद का भी स्वार्थ था। कर्ण की वफादारी ही थी जिसने दुर्योधन को जीत के लिए आश्वस्त किया।



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