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हिंदू सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है। इसे सभी व्रतों में सबसे ख़ास माना गया है। एक वर्ष में 24 एकादशी व्रत आते हैं और इन व्रतों का पालन करने से अत्यधिक पुण्य और सुख की प्राप्ति होती है। इस वर्ष में अब बस एक ही एकादशी बची है जो 30 दिसंबर को पड़ेगी। हिंदू शास्त्रों में हर एकादशी का अलग अलग नाम और महत्व स्पष्ट किया गया है। साल की आखिरी एकादशी पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को होगी, इस कारण यह सफला एकादशी होगी। यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है। विधि-विधान और श्रद्धा के साथ एकादशी का व्रत करने पर भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने भक्तों से प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और साधक अपने प्रयासों में सफल होते हैं। तो चलिए जानते हैं इस महत्वपूर्ण सफला एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और कथा के बारे में।

तिथि एवं व्रत पारण मुहूर्त
सफला एकादशी की शुरुआत 29 दिसंबर को शाम 04:12 बजे से होगी और यह 30 दिसंबर की दोपहर 01:40 बजे तक रहेगी। एकादशी की तिथि 30 दिसंबर को मानी जाएगी।
व्रत पारण का मुहूर्त 31 दिसंबर को सुबह 07:14 से 09:18 तक रहने वाला है।

पूजा विधि
एकादशी व्रत की शुरुआत दशमी तिथि के सूर्यास्त से ही प्रारंभ हो जाती है। दशमी तिथि को सूर्यास्त से पहले भोजन कर लें। इसके बाद एकादशी तिथि के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए। फिर भगवान विष्णु को दूध और गंगाजल से स्नान करवाएं और उनकी विधिवत पूजा करें। भगवान विष्णु को पीले रंग के वस्त्र, फल व फूलों से सुसज्जित करें और धूप, दीप, पंचामृत रोली, अक्षत, चंदन, पुष्प, तुलसी के पत्ते, अगरबत्ती, सुपारी आदि अर्पित करें। इसके बाद सफल एकादशी की कथा पढें और भगवान की आरती करके प्रसाद चढ़ाएं। फिर एकादशी की तिथि को दिनभर व्रत का पालन करें और रात में नारायण का भजन कीर्तन करके जागरण करें। अगले दिन पारण मुहूर्त में व्रत का पारण करें और सामर्थ्य अनुसार किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराएं और दान दें।

सफला एकादशी की कथा
मन्याताओं के अनुसार चम्पावती नगर के राजा महिष्मान के सबसे बड़े पुत्र लुम्भक का चरित्र बेहद अधार्मिक और दोषपूर्ण था। वह देवी देवताओं और बड़ों का अपमान और अधार्मिक कार्यों में लिप्त रहता था। इस कारण उसे राजा महिष्मान ने राज्य से ही बाहर कर दिया। इसके बाद लुम्भक जंगल में रहने लगा।
पौष माह की कृष्ण पक्ष दशमी को वह जंगल में अत्यधिक ठंड के कारण वह मूर्छित सा हो गया। अगले दिन जब धूप निकली तब उसे होश आया। इसके बाद उसने कुछ फल इक्कठा करके पीपल के पेड़ के नीचे रख दिए और ग्लानि की भावना के साथ कहा कि ‘इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान विष्णु प्रसन्न हो।' इसके बाद पूरी रात वह अतीत के अपने बुरे कर्मों और वर्तमान के दुखों पर विचार करता रहा। इस तरह अनजाने में ही उसका एकादशी व्रत पूरा हो गया और इस व्रत के प्रभाव से वह अच्छे कर्मों की ओर उन्मुख हुआ। भगवान विष्णु की कृपा से उसे राजगद्दी मिली जिसे आगे चलकर उसने अपने पुत्र को सौंपकर भगवान विष्णु की अराधना में खुद को समर्पित कर दिया और उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।



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