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उत्तराधिकारी – अध्यात्मिक कहानी

उसने कहा कि उसका चुनाव एक प्रतियोगिता पर आधारित होगा। जो कोई भी इस पद पर नियुक्त होना चाहता है उसे अपने अध्यात्मिक ज्ञान का प्रदर्शन एक कविता के द्वारा प्रस्तुत करना होगा।
प्रधान (मुख्य) साधु जो सबसे स्पष्ट (प्रमुख) उत्तराधिकारी था, उसने एक कविता प्रस्तुत की जो अच्छी और व्यव्हारिक थी।
सभी साधुओं ने प्रत्याशित रूप से उसे अपने नए नेता के रूप में चुन लिया। तथापि अगली सुबह दालान में एक दूसरी कविता दिखाई दी जो स्पष्ट रूप से रात के अँधेरे में लिखी गई थी।
इस कविता ने अपनी रम्यता और गहराई से सबको अचंभित कर दिया परंतु कोई भी ये नहीं जानता था कि यह कविता किसने लिखी है।
इस व्यक्ति को ढूंढने का निश्चय करके वृद्ध गुरू ने सभी साधुओं से पूछताछ प्रारंभ की| जाँच पड़ताल के बाद जब उसे पता चला कि वह आदमी और कोई नहीं बल्कि रसोई का शांत कर्मचारी है जो भोजन के लिए चाँवल कूटता है तब उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।
इस बात को सुनकर ईर्ष्यालू प्रमुख भिक्षु ने अपने साथियों के साथ मिलकर अपने प्रतिद्वंद्वी को मारने की योजना बनाई।
वास्तव में (रहस्यमय रूप) वृद्ध गुरू ने अपना वस्त्र और चाँवल का कटोरा उस चाँवल कूटने वाले को दे दिया था जो मठ से जल्द ही भाग गया और बाद में आगे चलकर एक प्रसिद्द अध्यात्मिक गुरू बना।



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