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विजया एकादशी के व्रत से मिलता है हर क्षेत्र में विजय होने का आशीर्वाद, भगवान श्रीराम को भी हुआ था लाभ
हिन्दू धर्म में एकादशी के व्रत को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। लाखों उपासक इस दिन व्रत का पालन करते हैं और पूरी श्रद्धा से पूजन विधि करते हैं। इन्हीं में से एक विजया एकादशी भी है। यह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और शत्रुओं और अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करने की प्रार्थना पूरी होती है। जानते है इस एकादशी व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और कथा के बारें में।

विजया एकादशी की तिथि एवं मुहूर्त
विजया एकादशी तिथि का प्रारंभ शनिवार, 26 फरवरी को सुबह 10:39 बजे से हो जाएगा, जो अगले दिन 27 फरवरी को सुबह 08:12 बजे तक चलेगा। इसके साथ ही इस बार एकादशी तिथि पर सर्वार्थ सिद्धि योग और त्रिपुष्कर योग भी बन रहा है जो इसे और अधिक विशेष बनाएगा। 26 फरवरी के दिन दोपहर 12:11 बजे से 12:57 तक पूजा का शुभ मुहूर्त रहेगा।

विजया एकादशी का महत्व
वैसे तो सभी एकादशी के व्रत का अपना महत्व होता है। विजया एकादशी भी विजय और सफलता प्राप्ति की दृष्टि से ज़रूरी होती है। इस दिन भगवान विष्णु की उपासना की जाती है। इस व्रत का पालन करने से कार्यों में सफलता मिलती है, विपत्तियों से छुटकारा मिलता है और अपने दुश्मनों पर विजय प्राप्त हो सकती है।

विजया एकादशी की कथा
माता सीता को लाने और रावण के साथ युद्ध करने के रास्ते में सागर की अड़चन थी और कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ने पर श्रीराम ने चिंता व्यक्त करते हुए लक्ष्मण से पूछा कि हम आगे कैसे जा सकते हैं। तब लक्ष्मण ने कहा कि थोड़ी दूरी पर वकदालभ्य मुनि का आश्रम है और हमें उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए। मुनिवर ने सुझाव दिया कि "हे राम आप अपनी सेना समेत फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखें, इस एकादशी के व्रत से आप निश्चित ही समुद्र को पार कर रावण को पराजित कर देंगे। श्री रामचन्द्र जी ने तब उक्त तिथि के आने पर अपनी सेना समेत मुनिवर के बताये विधान के अनुसार एकादशी का व्रत रखा और सागर पर पुल का निर्माण कर लंका पर चढ़ाई की और युद्ध में विजयी हुए। तब से इस एकादशी को विजया एकादशी के रूप में जाना जाता है।

विजया एकादशी की पूजन विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूरे दिन व्रत का पालन करें। इस दिन भगवान् विष्णु और माता लक्ष्मी की की उपासना करें। पूजा में फल, फूल, तुलसीदल, गंगाजल, दिए व धूप का प्रयोग करें। जल से भरे और अशोक से पत्ते से सजे कलश की भी स्थापना करें। एकादशी के दिन विष्णु की पूरी श्रद्धा से पूजा करें और पूरे दिन व्रत का पालन करें। अगले दिन यानि द्वादशी तिथि के दिन भी सुबह सुबह विष्णु पूजा करके व्रत पारण करें और दान दक्षिणा का पुण्य करें।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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