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दुर्गा पूजा 2017 – बंगाली लोग महालया पर्व क्यों मनाते हैं

जबकि कई बंगाली इस दिन को रेडियों पर स्वर्गीय बीरेन्द्र कृष्ण भद्र द्वारा रचित पवित्र छंदों की जादुई आवाज को सुनकर मनाते हैं, पर महालया इससे कहीं बढ़कर है।
शरद ऋतु, जो इसी दिन से शुरू होती है, के आने भर से ही लोग त्यौहारों के लिए तैयारी करने लगते हैं।
महालया, जोकि देवी पक्ष की शुरुआत और पितृ पक्ष के अंत का प्रतीक है (श्राध्द और शोक काल), बंगालियों के लिए एक शुभ दिन है, जो इसे बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं।
महालया को दुर्गा पूजा के सात दिन पहले मनाते है।

जब कि इस अवसर से जुङी बहुत सी लोककथायें हैं, सबसे प्रचलित लोककथा के अनुसार महालया में देवी को अपनें बच्चों के साथ कैलाश से अपनें पैतृक घर (पृथ्वी) तक की यात्रा शुरू करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। यह निमंत्रण मंत्रों के जप के माध्यम से और जागो तुमी जागो और बाजलो तोमर एलोर बेनू जैसे भक्ति गीतों को गाते हुए दिया जाता है।
हिन्दुओं के लिए इस दिन का विशेष महत्व है, जो कि तर्पण (अर्पण) करते हैं। पुरुष धोती पहन कर गंगा नदी के किनारे जाते हैं और अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना और पिन्ड दान करते हैं।
1930 में, महालया रेडियों पर पहली बार प्रसारित हुआ था। बाद में इसे बिरेन्द्र कृष्ण भद्र की आवाज में रिकार्ड किया गया और इस दिन बजाया जाने लगा । पौराणिक कथाकार पवित्र छंदों को गाते हैं और अनोखे अंदाज में माँ दुर्गा के पृथ्वी पर अवतरण की कहानी सुनाते हैं।



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