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International Malala Day: 15 की उम्र में बनी तालिबानी गोलियों का शिकार, अब दुनिया मनाती है मलाला डे
अगर हौसले बुलंद हो तो चेहरे पर लगी गोली भी आपके कदम नहीं डगमगा सकती। ये पंक्ति मलाला युसुफजई की जिंदगी को प्रतिबिंबित करती है। वर्ष 2012 की अक्टूबर में 15 वर्षीय मलाला का नाम दुनिया के कोने कोने तक पंहुचा जब वे तालिबानी गोलियों का शिकार बनीं।
अपने हार ना मानने वाले जज़्बे और करोड़ लोगों की दुआओं से वो स्वस्थ हुईं और लड़कियों की शिक्षा और महिला अधिकारों को लेकर अपनी लड़ाई को जारी रखा।

हर साल 12 जुलाई (मलाला के जन्मदिन के दिन) को संयुक्त राष्ट्र मलाला यूसुफजई को उनकी बहादुरी और उनके योगदान के लिए सम्मानित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मलाला दिवस मनाता है। नोबेल पुरस्कार विजेता और पाकिस्तानी कार्यकर्ता, मलाला तालिबान प्रतिबंधों का विरोध करने के लिए 2012 में गोली मारे जाने के बाद लड़कियों की शिक्षा के लिए लड़ाई का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बन गईं। जानते हैं मलाला युसुफजई की प्रेरणा से भरी जिंदगी और इस अंतर्राष्ट्रीय मलाला डे के बारे में विस्तार से -
जन्म और शुरूआती जीवन
मलाला का जन्म 12 जुलाई 1997 को स्वात घाटी के सबसे बड़े शहर मिंगोरा में जियाउद्दीन यूसुफजई के घर हुआ था, जो अब पाकिस्तान का खैबर पख्तूनख्वा प्रांत है। उनके पिता, जो हमेशा शिक्षा के पक्षधर थे, शहर में एक शिक्षण संस्थान चलाते थे और इसलिए, स्कूल मलाला के परिवार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
2007 में तालिबान के नियंत्रण के बाद, स्वात घाटी में हालात बदतर हो गए और इसका असर उसके परिवार और वहां रहने वाले समुदाय पर पड़ा। इस कारण, लड़कियों के स्कूल जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, नृत्य जैसी सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने और यहां तक कि टेलीविजन देखने पर भी रोक लगा दिये गये। तब मलाला केवल 9-10 साल की थीं।
कैसे शुरू हुई मलाला की लड़ाई?
तालिबानी आतंकी अभियान के दौरान, 2008 के अंत तक लगभग 400 स्कूल नष्ट कर दिए गए और वहां आत्मघाती हमले रोजाना की बात बन गए। लेकिन मलाला का मानना था कि शिक्षा का अधिकार सभी के लिए है और इसलिए, वह तालिबान के खिलाफ खड़ी हुईं और स्कूल जाने के लिए दृढ़ संकल्पित रहीं । पाकिस्तानी टेलीविजन पर एक बार उन्होंने कहा था, 'तालिबान ने मेरी शिक्षा का बुनियादी अधिकार छीनने की हिम्मत कैसे की?'
दो साल बाद, 2009 में, 11 वर्षीय मलाला ने ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (बीबीसी) की उर्दू भाषा साइट पर गुमनाम रूप से 'गुल मकई' नाम से ब्लॉग लिखना शुरू किया। उन्होंने अपने जीवन के दैनिक संघर्षों, स्कूल जाने की इच्छा, स्वात घाटी में तालिबान शासन के तहत घर पर रहने के लिए मजबूर होने के बारे में लिखा और बार-बार आतंकवादी समूह के इरादों पर सवाल उठाया। उनके पहले ब्लॉग का शीर्षक 'मुझे डर लग रहा है' था, जिसमें स्वात घाटी में पूर्ण युद्ध की भयावहता और स्कूल जाने से डरने के बुरे सपने का जिक्र किया गया था।
जब तालिबान के साथ पाकिस्तान का युद्ध तेजी से आगे बढ़ रहा था, 5 मई 2009 को मलाल और उनके परिवार को आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्ति (आईडीपी) घोषित कर दिया गया और उन्हें अपना घर छोड़कर सैकड़ों मील दूर शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। कुछ हफ़्ते बाद, अपनी वापसी पर मलाला ने मीडिया की मदद ली और स्कूल जाने के अपने अधिकार के लिए अपना सार्वजनिक अभियान जारी रखा।
3 वर्षों की अवधि में, मलाला और उनके पिता पाकिस्तानी लड़कियों के लिए मुफ्त लेकिन क्वालिटी एजुकेशन के ध्वजवाहक बन गए। इस निडर सक्रियता के परिणामस्वरूप 2011 में अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार के लिए उनका नामांकन भी हुआ। उन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। हालाँकि, उनके खुद के देश में उनके ये कदम कट्टर धर्म पंथियों और तालिबानी ठेकेदारों को बिल्कुल रास नहीं आए।
15 वर्ष की छोटी सी उम्र में मलाला पर चली गोली
9 अक्टूबर 2012 की सुबह, 15 वर्षीय मलाला को तालिबान ने उस समय गोली मार दी थी जब वह स्कूल से घर जाने वाली बस में बैठी थीं और अपने दोस्तों के साथ स्कूल के काम के बारे में बात कर रही थी। बस को तालिबान के दो सदस्यों ने रोका और उनमें से एक ने मलाला से उसका नाम पूछा और उस पर तीन गोलियां चला दीं।
एक गोली उनके सिर में लगी और बाहर निकल गई और कंधे में जा धंसी। मलाला गंभीर रूप से घायल हो गईं और उन्हें पेशावर के एक पाकिस्तानी सैन्य अस्पताल में ले जाया गया। कुछ दिनों बाद उन्हें इंग्लैंड के बर्मिंघम के अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया।
गोली लगने के कारण कोमा में चली गयी थीं मलाला
मलाला के चेहरे के बाएं हिस्से को ठीक करने के लिए कई सर्जरी की आवश्यकता पड़ी, जो लकवाग्रस्त हो गया था। वह 16 अक्टूबर 2012 को कोमा से उठीं और महीनों के उपचार और थेरेपी के बाद, मार्च 2013 में, वह बर्मिंघम में स्कूल जाने में सक्षम हुईं। उनके चमत्कारिक ढंग से ठीक होने और स्कूल में वापसी ने दुनिया भर में बहुत ध्यान आकर्षित किया और उनके लिए वैश्विक समर्थन की लहर दौड़ गई।
मलाला को किस लिए सम्मानित किया गया? देखें पुरस्कारों और उपलब्धियों की सूची
अपने 16वें जन्मदिन यानी 12 जुलाई 2013 को, मलाला ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में भाषण दिया और उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली पुस्तक, एक आत्मकथा 'आई एम मलाला: द गर्ल हू स्टूड अप फॉर एजुकेशन एंड वाज़ शॉट बाय द तालिबान' प्रकाशित की।
10 अक्टूबर 2013 को, उनके काम की स्वीकृति में, यूरोपीय संसद ने मलाला को विचार की स्वतंत्रता के लिए प्रतिष्ठित 'सखारोव' पुरस्कार से सम्मानित किया।
अक्टूबर 2014 में, 17 साल की उम्र में, मलाला ने नोबेल शांति पुरस्कार जीता। वह यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पाने वाली सबसे कम उम्र की व्यक्ति बन गईं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अवॉर्ड स्वीकार करते हुए मलाला ने कहा कि 'यह अवॉर्ड सिर्फ मेरे लिए नहीं है। यह उन भूले-बिसरे बच्चों के लिए है जो शिक्षा चाहते हैं। यह उन डरे हुए बच्चों के लिए है जो शांति चाहते हैं। यह उन बेजुबान बच्चों के लिए है जो बदलाव चाहते हैं।'
इस वर्ष मलाला अपना 26वां जन्मदिन कहां मना रही हैं?
वह अपना 26वां जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रही हैं। उन्होंने कई देशों, शरणार्थी शिविरों की अपनी पिछली यात्राओं को ट्विटर पर याद किया और महामारी से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद इस वर्ष अपनी 'बहनों' के साथ इस अवसर को मनाने की उत्सुकता व्यक्त की।
मलाला ने ट्विटर पर लिखा, 'यह विश्वास करना मुश्किल है कि कल मेरा 26वां जन्मदिन है - संयुक्त राष्ट्र में बोलने के दस साल बाद। 16 वर्षीय मलाला को पता नहीं था कि आगे क्या होगा, वह कितने अद्भुत लोगों से मिलेगी, वह किन जगहों पर जायेगी। वह लड़कियों की शिक्षा के लिए अपनी लड़ाई जारी रखने के लिए दृढ़ संकल्पित थीं। उस दिन के बाद से, मैंने अपना जन्मदिन लड़कियों के साथ मनाने की प्रतिबद्धता जताई, एक परंपरा जो मुझे नाइजीरिया, केन्या, ब्राजील और इथियोपिया और लेबनान, रवांडा और इराक के शरणार्थी शिविरों में ले आई है। और जबकि महामारी ने यात्रा पर एक संक्षिप्त विराम लगा दिया, मैं इस वर्ष अपनी बहनों के साथ फिर से व्यक्तिगत रूप से जश्न मनाने के लिए रोमांचित हूं। मैं इस वर्षगाँठ को मनाने का इससे बेहतर तरीका नहीं सोच सकी और मुझे आशा है कि आप यह देखने के लिए मेरे साथ चलेंगे कि मैं कहां पहुंचती हूं।'
मलाला युसुफजई अपना 26 वां जन्मदिन किस तरह मनाती हैं इससे ज्यादा लोग इस बात को लेकर उत्सुक हैं कि उनके जीवन का अगला पड़ाव किन उपलब्धियों से भरा रहने वाला है। इतनी कम उम्र में ही महिला अधिकारों और शिक्षा को लेकर उनका काम यकीनन ही सराहनीय है और आगे भी यह जारी रहने की उम्मीद रहेगी। उन्होंने अपने पिता के सहयोग से शुरू किये मलाल फण्ड को अब अंतर्राष्ट्रीय पहचान दे दी हैं और आज दुनिया भर से मलाला फण्ड के लिए लोग अपना योगदान देते हैं।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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