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क्या लड़कियों का भी होता है जनेऊ संस्कार? धुरंधर 2 एक्ट्रेस ने बताया क्यों सदियों पहले बंद हुई थी परंपरा
Kya Ladkiyon Ka Janeu Sanskar Hota Hai: सनातन धर्म में यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार को केवल पुरुषों तक सीमित माना जाता है, लेकिन प्राचीन ग्रंथों और इतिहास के पन्ने कुछ और ही गवाही देते हैं। हाल ही में 'द कश्मीर फाइल्स' फेम अभिनेत्री भाषा सुंबली ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा साझा करते हुए एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे सदियों पहले कश्मीर में लड़कियों का भी जनेऊ संस्कार होता था, लेकिन विदेशी आक्रमणों के खौफ ने इस गौरवशाली परंपरा को 'बाल विवाह' जैसी मजबूरी में बदल दिया। भाषा सुंबली आज कश्मीर की वह पहली पंडित लड़की बनी हैं, जिन्होंने न केवल इस लुप्त होती परंपरा को जिया है, बल्कि अपनी मां के संघर्षों से प्रेरणा लेकर इसे पुनर्जीवित करने का संकल्प भी लिया है।

क्या लड़कियों का भी होता है यज्ञोपवीत संस्कार? (History of Women's Upanayana)
अक्सर यह माना जाता है कि जनेऊ केवल लड़कों के लिए है, लेकिन वैदिक काल में महिलाओं का भी उपनयन संस्कार होता था। वेदों के अध्ययन का अधिकार महिलाओं को भी था, जिसे 'ब्रह्मवादिनी' परंपरा कहा जाता था। हाल के वर्षों में यह परंपरा फिर से लौट रही है। पिछले साल काशी में लड़कियों का सामूहिक जनेऊ संस्कार हुआ, वहीं बिहार के कुछ गांवों में आज भी यह प्रथा जीवित है। भाषा सुंबली ने इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए कश्मीर की इस भूली हुई विरासत को नई पहचान दी है।
अफगान आक्रमण और 'बाल विवाह' का खौफनाक सच: क्यों बंद हुई यह परंपरा?
इतिहास गवाह है कि अफगान और मुगल आक्रमणों के दौरान कश्मीर में स्थितियां अत्यंत भयावह थीं। जब आक्रमणकारी छोटी बच्चियों को निशाना बनाने लगे, तो माता-पिता के पास सेल्फ डिफेंस का एक ही रास्ता बचा। बेटियों का यज्ञोपवीत (जो अविवाहित होने और शिक्षा का प्रतीक था) करने के बजाय, उन्हें सुरक्षित रखने के लिए 5-6 साल की उम्र में ही 'अठोर-डिजोर' (विवाह का प्रतीक) पहना दिया जाता था। बेटी को विवाहित बताकर बचाना उस समय की कड़वी सच्चाई थी। इसी रक्षात्मक कदम के कारण आध्यात्मिक शिक्षा और जनेऊ की परंपरा पीछे छूट गई और बाल विवाह ने जन्म लिया।
मां की विरासत: शिक्षा की पहली मशाल और वेदों का ज्ञान
भाषा सुंबली के इस क्रांतिकारी कदम के पीछे उनकी मां का बड़ा हाथ है। उनकी मां अपने गांव की पहली ब्राह्मण लड़की थीं, जिन्होंने लड़कों के बीच बैठकर न केवल स्कूली शिक्षा ली, बल्कि अपने भाइयों के साथ वेदों और चंडी पाठ का अध्ययन भी किया। उस दौर में जब लड़कियों का स्कूल जाना वर्जित था, भाषा की माँ ने अन्य लड़कियों के लिए रास्ता बनाया और शिक्षा के केंद्र की नींव रखी। माँ की इसी निडरता ने भाषा को अपनी जड़ों की ओर लौटने का साहस दिया।
भाषा ने लिया परंपरा को दोबारा जीने का संकल्प
सदियों से बंद पड़ी इस प्रथा को दोबारा शुरू करना एक बड़ा जोखिम था। भाषा बताती हैं कि जब उनके माता-पिता ने उनसे पूछा-"क्या तुम वह पहली महिला बनना चाहोगी जो इस परंपरा को पुनर्जीवित करे?" तो उन्होंने बिना झिझक हां कह दिया। आज भाषा सुंबली ने जनेऊ धारण कर समाज को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि ज्ञान, आध्यात्म और सनातन संस्कार पर महिलाओं और पुरुषों का समान अधिकार है। उनकी यह यात्रा कश्मीर की अस्मिता और स्त्री-शक्ति के पुनरुत्थान का एक नया अध्याय है।



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