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Phool Dei 2026: उत्तराखंड की देहरियों पर कब बरसेंगे फूल? जानें 'फूलदेई' त्योहार की तिथि, महत्व और परंपरा
Phool Dei 2026: पहाड़ों में वसंत का आगमन किसी उत्सव से कम नहीं होता। जब बर्फ की चादर पिघलती है और प्रकृति अपना श्रृंगार करती है, तब उत्तराखंड की देहरियों पर छोटे-छोटे बच्चे अपनी कंडोली (टोकरी) में ताजे फूल लेकर दस्तक देते हैं। बच्चे घर-घर जाकर एक खास गीत गाते हैं जो नीचे बताया गया है और फिर घर की दहलीज पर फूल डालते हैं। इसके बदले उन्हें पैसे, गुड़, चावल या फिर गिफ्ट मिलते हैं। 'फूलदेई' यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पहाड़ की जड़ों से जुड़ा एक ऐसा संस्कार है जो हमें प्रकृति को पूजना सिखाता है। 15 मार्च 2026 को मनाए जाने वाले इस पर्व पर उत्तराखंड का बच्चा-बच्चा 'प्रकृति का दूत' बनकर घर-घर खुशहाली का आशीर्वाद बांटता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि घरों की देहरी पर फूल क्यों रखे जाते हैं? और क्यों इस त्योहार को बच्चों का त्योहार कहा जाता है? आइए, इस लेख के जरिए देवभूमि की इस खूबसूरत परंपरा और इसके पीछे छिपी 'फ्यूंली' की उस भावुक कहानी को करीब से जानते हैं।

क्यों मनाते हैं फूलदेई?
फूलदेई मनाने के पीछे धार्मिक, सामाजिक और प्राकृतिक तीनों ही कारण समाहित हैं। यह त्योहार सर्दियों की विदाई और वसंत के स्वागत का प्रतीक है।
1. प्रकृति के प्रति आभार (Gratitude to Nature)
उत्तराखंड के लोग प्रकृति को ही ईश्वर मानते हैं। चैत्र संक्रांति के दिन जब नई फसल की उम्मीद जगती है, तो बच्चे जंगलों से बुरांश, फ्यूंली, बासिंग और सरसों के फूल चुनकर लाते हैं। इन फूलों को घर की देहरी पर रखना इस बात का प्रतीक है कि आने वाला पूरा साल फूलों की तरह खिला रहे और घर में अन्न-धन की कमी न हो।

2. 'फ्यूंली' की अमर प्रेम कहानी (The Legend of Phyunli)
लोक मान्यताओं के अनुसार, 'फ्यूंली' एक वनकन्या थी जिसका मायके (पहाड़) के प्रति प्रेम इतना गहरा था कि विदाई के बाद वह मायके की याद में मुरझा गई। उसकी अंतिम इच्छा के अनुसार उसे पहाड़ की चोटी पर दफनाया गया, जहां से वह एक पीले फूल के रूप में फिर से खिल उठी। माना जाता है कि वह राजकुमारी हर साल चैत्र में फूलों के रूप में अपने मायके लौटती है। उसकी इसी याद और वसंत की वापसी की खुशी में फूलदेई मनाई जाती है।
'फूल देई, छम्मा देई': देहरी पर गाए जाने वाले इस गीत का अर्थ
जब बच्चे किसी के घर की देहरी पर फूल डालते हैं, तो वे एक विशेष मंगल गान गाते हैं। इसके हर शब्द में एक दुआ छिपी होती है:
"फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार।"
फूल देई: आपकी देहरी हमेशा फूलों की तरह मंगलकारी रहे।
छम्मा देई: यदि जाने-अनजाने कोई भूल हुई हो, तो यह देहरी (घर) उसे क्षमा करे।
दैणी द्वार: भगवान इस घर के दरवाजे सबके लिए शुभ और सफल रखें।
भर भकार: आपके अनाज के भंडार (भकार) हमेशा भरे रहें।
कब है फूलदेई? (Phool Dei 2026 Date)
इस वर्ष चैत्र संक्रांति 15 मार्च 2026 को है। उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं दोनों ही क्षेत्रों में इसी दिन से फूलदेई का उत्सव शुरू होगा। कुछ गांवों में यह त्योहार पूरे आठ दिनों तक चलता है, जिसे 'अठवाड़' कहा जाता है। इस दिन एकादशी भी है।



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