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करगिल युद्ध में जान जोखिम में डाल सैनिकों को चाय पिलाता था ये चायवाला, तोलोलिंग जीतने में थी भूमिका
61 वर्षीय नसीम अहमद बीस सालों से चाय बेच रहे हैं। उत्तराखंड के देहरादून से ताल्लुक रखने वाले नसीम 1999 में करगिल युद्ध के दौरान जम्मू और कश्मीर के द्रास की दुर्गम पहाड़ियों वाली जगह पर चाय बेचने का काम किया करते थे। 1999 में जंग छिड़ जाने के बाद जहां लोग जान बचाकर घर और दुकानें छोड़कर भाग गए थे। वहीं नसीम अहमद इकलौते ऐसे शख्स थे जो अपनी जान की परवाह किए बगैर ही भारतीय सेना के प्रति सम्मान दिखाते हुए वहीं रुक गए। जहां एक भारतीय सैनिक दुश्मन सेना से लौहा ले रहे थे वहीं नसीम इन सैनिकों को कंपकंपाती ठंड में चाय पिलाकर देश और सेना के प्रति अपना समर्पण दिखा रहे थे।
आज करगिल युद्ध को 20 साल पूरे हो गए हैं। करीब 60 दिन तक चले इस इस युद्ध के दौरान भारतीय सेना के जाबांजों ने उनकी अदम्य साहस के बल पर करगिल की अलग-अलग चोटियों पर विजय हासिल कर दुश्मनों को खदेड़ निकाला था। इसी चोटी में से एक तोलोलिंग थी। जिस पर फतह हासिल करना करगिल युद्ध के उपलब्धियों में से एक थी। इस चोटी को फतह करने में जितना श्रेय भारतीय सेना के जाबांज सैनिकों को जाता है वहीं थोड़ा सा श्रेय इस चायवाले को भी जाता है। नसीम इस युद्ध के वो हीरो है जो जंग न लड़कर भी अपने समपर्ण और सेवा भाव के लिए याद किए जाएंगे। दरअसल जब तोलोलिंग की चोटी पर फतह पाने के लिए भारतीय जाबांज अपनी जान की बाजी लगा रहे थे, वहीं इस चोटी के आसपास के दुगर्म इलाकों में नसीम चाय और खाना बनाकर भारतीय सैनिकों की सेवा कर रहे थे।
नसीम चाहते तो बाकियों की तरह वो भी जंगी इलाकों से दूर जा कर खुद को महफूज रख सकते थे लेकिन नसीम अहमद ने ऐसा नहीं किया और वह वहीं टिके रहें। वो इन इलाकों में रहकर रहकर अपनी चाय की दुकान चलाते रहे और भारतीय सैनिकों को चाय सर्व करते रहे।

चाहते तो खुद की जान बचा सकते थे
नसीम ने कहा, "मुझे द्रास से निकलने के कई मौके मिले लेकिन मेरा दिल इस बात के लिए नहीं माना, इतना ही नहीं मेरी दुकान पर काम करने वाले लोग भी भाग गए थे। इलाके में केवल कुछ ही चाय की दुकानें थीं। करगिल युद्ध के दौरान जान बचाने के लिए सभी लोग दुकानें बंद करके चले गए थे। मौजदा हालात को देखते हुए मैंने फैसला किया कि द्रास में ही रुकूंगा और भारतीय सेना के लिए सेवा दूंगा।"
इसके बाद नसीम अहमद ने कहा, "सेना का दस्ता द्रास के जरिए गुजरता और मेरे चाय के स्टॉल पर आकर रुकता। मैं उन्हें चाय पिलाता और खाना खिलाता। मैं जानता था कि यह खतरनाक है लेकिन मुझे लगा कम से कम इस तरह से ही मैं देश के लिए अपनी तरफ से कुछ योगदान दे सकूंगा।

एक आर्मी ऑफिसर के कहने पर रुक गए नसीम
पिछले दिनों को याद करते हुए नसीम अहमद ने कहा, "एक आर्मी ऑफिसर मेरे ही शहर देहरादून से ताल्लुक रखते थे, उन्होंने मुझे इस चीज के लिए प्रेरित किया कि मैं यहां रहूं और सेना को मदद कर संकू। मुझे आर्मी से राशन मिलता था और मैं जवानों के लिए चाय और खाना तैयार करता था। सेना के लिए यह सब करना मुझे संतुष्टि देता था। मैं यह सब अपनी जिंदगी में कभी नहीं भूल सकता। वो दिन सचमुच में बहुत मुश्किल थे।"
बीते दिनों को याद कर नसीम ने बताया, "मैं ऊपर वाले से प्रार्थना करता हूं कि युद्ध का ये मंजर फिर कभी देखने को न मिले। द्रास पहले की तुलना में अब काफी बदल चुका है और करगिल वॉर की वजह से द्रास भी अब दुनियाभर में जाना जाता है।

इन लोगों की बहादुरी से फतह किया था तोलोलिंग
तोलोलिंग चोटी को वापस भारत के कब्जे में लाने के लिए मेजर राजेश अधिकारी, दिगेंद्र कुमार कर्नल रवींद्रनाथ, ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल विश्वनाथन ने अहम भूमिका निभाई थी।
मेजर राजेश अधिकारी (मरणोपरांत) और दिगेंद्र कुमार को तोलोलिंग चोटी हासिल करने में उनकी अहम भूमिका के लिए भारत के दूसरे सबसे बड़े सैन्य सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। लेफ्टिनेंट कर्नल विश्वनाथन भी शहीद हो गए। मरणोपरांत उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। वहीं, ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर को युद्ध सेवा मेडल दिया गया। वहीं कर्नल रवींद्रनाथ को लड़ाई में उनकी भूमिका के लिए वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।



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