Shaheed Diwas 2024: जहां दी गई थी भगत सिंह को फांसी, जानें क‍िस हाल में है अब वो जगह?

Where Bhagat Singh was hanged: 23 मार्च 1931 का हर हिंदुस्‍तानी के दिल में बसा हुआ है। ये दिन दुर्भाग्‍यपूर्ण दिन भारत के इतिहास के पन्‍नों में काली स्‍याही से दर्ज है। ये वो ही दिन है जब भगत सिंह और उनके साथियों को राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर लाहौर सेंट्रल जेल (Lahore Central Jail) में फांसी दी गई थी। जब भी कैलेंडर में ये दिन आता है।

इस दिन शहीदे आजम भगतसिंह और उनके साथियों के शहादत के क‍िस्‍सों को जरुर याद क‍िया जाता है। कैसे अंग्रेजी हुकूमत ने जनता के आक्रोश से डरते हुए तय समय से पहले ही इन क्रांतिवीरों को फांसी दे दी थी।

bhagat singh in lahor jail

क्‍या आपको पता है जहां भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी पर लटकाया गया था, साल 1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद ये जेल पाकिस्तान के ह‍िस्‍से चली गई। आइए शहीद दिवस के मौके पर जानते हैं क‍ि जहां शहीदे आजम ने जिंदगी की अंतिम दिन बिताए थे अब आज उस जगह की क्या हालत है?

lahor central jail-1931

बन चुकी हैं नई इमार‍तें

अब लाहौर सेंट्रल जेल ( जहां भगतसिंह को कैद कर रखा था) को तोड़कर वहां शादमा कॉलोनी बस चुकी हैं और वहां एक मजिस्‍द बना दी गई है। जानकारी के अनुसार जिस फांसी के तख्‍त पर शहीदे आजम को फांसी दी गई थी, वहां अब एक चौराहा बना दिया गया हैं।

The Martyr Bhagat Singh Experiments In Revolution

मैदान बन चुकी हैं अब वो कोठारियां जहां शहीदे आजम ने बिताएं थे आखिरी समय

पत्रकार और लेखक कुलदीप सिंह नैयर ने अपनी किताब The Martyr Bhagat Singh Experiments In Revolution में इस बात का ज़िक्र किया है कि जेल की जिन कोठरियों में तीनों क्रांतिकारी ने अपने जिंदगी के अंतिम दिन बिताए थे। अब वो जगह टूट चुकी है, उनकी दीवारें अब वक्‍त के साथ मैदान में तब्‍दील हो चुकी हैं, क्योंकि हुकुमत-ए-पाक‍िस्‍तान भगत सिंह और उनके साथियों के शहादत से जुड़ी कोई भी निशानी सहजकर नहीं रखना चाहता है।

Where is lahor central jail

फांसी के तख्‍त को बना दिया चौक

1961 में लाहौर सेंट्रल जेल को धवस्त करके फांसी घर (जहां भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दी गई थी) की जगह एक चौक बना दिया गया। जिसका नाम शादमान चौक रखा गया लेकिन पाकिस्‍तान के कई सामाजिक और राजनीतिक संगठन के विरोध के चलते इस जगह का नाम शादमान चौक से बदलकर भगतसिंह चौराहा रख दिया गया। वहीं फैसलाबाद जिले के लयालपुर जिले में स्थित भगतसिंह के घर को म्‍यूजियम बनाने के लिए भी ह्यूमन राइट एक्टिविस्‍ट ने मांग की थी।

bhagat singh chowk in paksitan

एक दिन पहले दी गई थी फांसी

आपको बता दें क‍ि भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी देने का दिन 24 मार्च मुकर्रर किया गया था। लेकिन पूरे देश में हो रहे विरोध प्रदर्शन के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने डरकर एक दिन पहले 23 मार्च 1981 शाम 7 बजकर 33 मिनट पर फांसी दे दी गई।

bhagat singh last rite in hussianwala village

उसके बाद जनता के आक्रोश को देखते हुए पुलिस ने लाहौर सेंट्रल जेल की पिछली दीवार तोड़, एक ट्रक में लाश भरकर सतलुज नदी के किनारे गुप-चुप तरीके से जलाया जाने लगा। आग देख कर वहां भारी मात्रा में भीड़ जुट गई । जिसे देख अंग्रेजों ने जलते हुए शवों को नदी में फेंककर भाग गए। बाद में कसूर जिले के हुसैनवाला गांव में तीनों शहीदों का अंतिम संस्‍कार करवाया गया।

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