Latest Updates
-
सुबह खाली पेट जौ का पानी पीने से दूर होंगी ये 5 समस्याएं, जानें इसे बनाने का तरीका -
Baglamukhi Jayanti 2026: बगलामुखी जयंती कब है? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि -
फैटी लिवर में कौन सा योग करें? जानें लिवर को साफ और मजबूत रखने के लिए योगासन -
May 2026 Vrat Tyohar: वट सावित्री, शनि जयंती सहित मई माह में पड़ रहे हैं कई व्रत-त्योहार, देखें पूरी लिस्ट -
Swapna Shastra: सपने में मरे हुए व्यक्ति को देखने का क्या मतलब होता है? जानें ये शुभ होता है या अशुभ -
Bael Juice Benefits: गर्मियों में रोजाना पिएं एक गिलास बेल का जूस, सेहत को मिलेंगे ये 5 फायदे -
Who Is Divyanka Sirohi: कौन हैं एक्ट्रेस दिव्यांका सिरोही? जिनका 30 साल की उम्र में हार्ट अटैक से हुआ निधन -
Kedarnath Yatra 2026: केदारनाथ यात्रा आज से शुरू, रजिस्ट्रेशन से हेलीकॉप्टर बुकिंग तक जानें सभी जरूरी नियम -
बालों की ग्रोथ के लिए इस तरह करें केले के छिलके का इस्तेमाल, कुछ ही दिनों में घुटनों तक लंबे हो सकते हैं बाल -
दीपिका कक्कड़ की MRI रिपोर्ट में मिले 2 नए सिस्ट, अब होगी इम्यूनोथेरेपी, जानें क्या है ये ट्रीटमेंट
इन 14 संकेतो से जानें कि गर्भ में पल रहा बेबी स्वस्थ है या नहीं

नवजात वातावरण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। मौसम और आसपास का वातावरण उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। बच्चे के जन्म के बाद उनके विकास के शुरूआती सालों में उन्हें कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं। लेकिन बच्चे के बीमार पड़ने पर हमें तुरंत आभास हो जाता है और इलाज कराकर उन्हें आसानी से ठीक किया जा सकता है। लेकिन अगर गर्भ में पल रहे बच्चे का स्वास्थ ठीक न हो तो इसका पता हम कैसे लगाएंगे।
आगे बात करने से पहले हम आपको संयुक्त राष्ट्र के विंग यूनिसेफ की उस रिपोर्ट के बारे में जरूर बताना चाहते हैं, जिसके अनुसार, अगर गर्भवती महिला कुपोषित है, तो उसके बच्चे के कुपोषित होने की संभावना बहुत अधिक रहती है। इसका असर खास तौर से बच्चे के ब्रेन पर पड़ता है। यानी अगर आप अच्छे दिमाग वाला बच्चा चाहती हैं तो गर्भावस्था के दौरान खान-पान का खास ख्याल रखें।
गर्भ में पल रहा बच्चा अगर अस्वस्थ हो तो प्रेगनेंट महिला का शरीर उसे तुरंत इस बात का संकेत देने लगता है। इसलिए प्रेगनेंट महिलाओं को अपने शरीर में दिखने वाले बदलाओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यहां हम आपको प्रेगनेंसी के दौरान शरीर में दिखने वाले ऐसे 14 लक्षणों के बारे में बताने जा रहे हैं जिससे आप आसानी से पता कर सकती हैं कि आपके गर्भ में पल रहा भ्रूण स्वस्थ है या नहीं।

1. बच्चे की धड़कन महसून न होना
प्रेगनेंसी के करीब पांचवें हफ्ते में बच्चे का दिल धड़कना शुरू हो जाता है लेकिन दसवें हफ्ते या तीसरे महीने के अंत में डॉप्लर टेस्ट के कराकर इसका पता आसानी से लगाया जा सकता है। कभी-कभी ये पता नहीं चल पाता है कि बच्चे का दिल धड़क रहा है या नहीं। गर्भ में बच्चे की पोजिशन या प्लेसेंटा के स्थान में परिवर्तन के कारण ऐसी समस्या हो सकती है। लेकिन अगर अगले टेस्ट में भी बच्चे की धड़कन का पता न चल पा रहा है तो इसका मतलब यह है कि भ्रूण तनाव और कठिनाई में है और इससे भ्रूण के नष्ट होने का भी खतरा बना रहता है।

2. पेट कम निकलना :
पेट के बढ़ने से गर्भाशय का पता चलता है। इसका माप गर्भाशय के ऊपर से प्यूबिक बोन तक किया जाता है। जब भ्रूण बढ़ता है तब गर्भाशय बड़ा होने लगता है लेकिन अगर गर्भाशय का आकार बड़ा नहीं हो रहा है तो इसका मतलब भ्रूण गर्भाशय में ही खराब हो चुका है। यह जानने के लिए आमतौर पर एक टेस्ट कराना पड़ता है।

3. आईयूजीआर से भ्रूण की स्थिति जानना :
आईयूजीआर गर्भ में पल रहे बच्चे की स्थिति की जानकारी देता है। यदि इंट्रायूटेरिन ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन सकारात्मक पाया जाता है तो इसका मतलब यह है कि भ्रूण का विकास सही तरीके से नहीं हो रहा है। प्लेसेंटा या किडनी में परेशानी और डायबिटीज इसकी वजह हो सकती है। इस तरह की समस्या होने पर प्रेगनेंट महिला को डॉक्टर के अधिक देखरेख की जरूरत पड़ती है क्योंकि आईयूजीआर के साथ जन्मे बच्चों में सांस लेने में तकलीफ, ब्लड शुगर, शरीर के टेम्परेचर में उतार-चढ़ाव जैसी दिक्कतें आती हैं।

4. एचसीजी लेवल कम होना :
महिलाओं के शरीर में ह्यूमन कोरिओनिक गोनाडोट्रोपिन नामक हार्मोन होता है जो गर्भावस्था के शुरूआत में फर्टिलाइजेशन के बाद अंडे को पोषण देने का काम करता है जिससे अंडा विकसित होता है। प्रेगनेंसी के आठवें से ग्यारहवें हफ्तें में एचसीजी का स्तर चरम पर होता है और ब्लड टेस्ट के जरिए इसकी गणना की जाती है। एचसीजी का स्तर 5एमआईयू/एमएल से कम होने पर गर्भपात या एक्टोपिक प्रेगनेंसी की समस्या उत्पन्न हो सकती है।

5. पेट में अधिक अकड़न होना :
प्रेगनेंट होने के बाद महिलाओं को इस स्थिति से किसी भी समय दो-चार होना पड़ सकता है। प्रेगनेंसी के शुरूआत में गर्भाशय में खून के प्रवाह के कारण ठीक उसी तरह ऐंठन महसूस होती है जैसे कि पीरिएड के समय होता है, इसे आमतौर पर सामान्य माना जाता है। यदि ब्लीडिंग के साथ यह ऐंठन सिर्फ एकतरफा हो रही हो तो इसकी जांच करानी चाहिए। अगर ऐसी स्थिति दूसरे या तीसरे त्रैमासिक में हो रही हो तो यह प्रसव के पहले होने वाला दर्द हो सकता है।

6. प्रेगनेंसी के दौरान ब्लीडिंग :
प्रेगनेंसी के दौरान योनि से खून निकलना वास्तव में चिंता की बात है। यहां तक कि खून की एक बूंद भी दिखने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि आपका बच्चा सुरक्षित है या नहीं। कुछ मामलों में गर्भपात, हार्मोनल ब्लीडिंग और इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग की वजह से भी यह दिक्कत आती है। इसके अलावा प्लेसेंटा में परेशानी होने के कारण भी ऐसा होता है, इस स्थित में बच्चा समय से पहले ही पैदा हो जाता है।

7. पीठ और कमर में दर्द :
प्रेगनेंट होने पर पीठ और कमर में दर्द होना सामान्य बात है क्योंकि जैसे-जैसे भ्रूण बढ़ता है शरीर का वजन भी भारी होने लगता है। जिससे रीढ़ की हड्डी खासतौर पर पीठ और कमर की हड्डी पर अधिक दबाव पड़ता है। यदि अधिक समय तक और लगातार यह दर्द बना रहे तो आपको सावधान रहने की जरूरत है। क्योंकि कभी-कभी यह दर्द किडनी या ब्लैडर में इंफेक्शन, प्रसव से पहले का दर्द या गर्भपात के कारण भी हो सकता है।

8. योनि से तरल पदार्थ निकलना :
वैसे तो महिलाओं में योनि से तरल पदार्थ स्रावित होना सामान्य बात है लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान यह बढ़ जाता है। ये तरल पदार्थ साफ, पारदर्शी और रंगहीन होते हैं। लेकिन यदि स्राव के साथ दुर्गन्ध, खून या दर्द महसूस हो रहा हो तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। यह गर्दन में सूजन होने की स्थिति हो सकती है जहां कार्विक्स समय से पहले ही खुल जाता है जो गर्भपात होने का संकेत देता है।

9. असामान्य अल्ट्रासाउंड :
गर्भ में जब भ्रूण बढ़ने लगता है तो अल्ट्रासाउंड के जरिए उसके आकार, वजन, हलचल, खून के प्रवाह, हृदय की धड़कन और एमनियोटिक तरल पदार्थ की मात्रा की जांच की जाती है। अगर बच्चे के विकास में कोई परेशानी आती है तो डॉक्टर उसे अल्ट्रासाउंड के माध्यम से पता कर लेते हैं। हालांकि अधिक जानकारी के लिए अल्ट्रासाउंड के साथ अन्य टेस्ट भी कराना चाहिए।

10. प्रेगनेंसी का पता लगने के बाद भी एक निगेटिव प्रेगनेंसी टेस्ट कराना चाहिए :
आजकल घर बैठे प्रेगनेंसी टेस्ट करना काफी आसान हो गया है। पीरिएड रूकने के बाद महिलाएं घर पर ही अपनी प्रेगनेंसी का पता कर सकती हैं। हालांकि डॉक्टर को दिखाने के बाद ही इसकी सही पुष्टि की जा सकती है। यहां तक कि सबकुछ ठीक रहने के बाद भी एक ऐसी स्थिति पैदा होती है जब महिला को लगता है कि वह प्रेगनेंट नहीं है। यदि दूसरा टेस्ट नकारात्मक रहता है तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए ताकि तत्काल प्रेगनेंसी के बारे में पता लगाया जा सके।

11. भ्रूण में हलचल न होना :
प्रेगनेंसी के 18वें हफ्ते में गर्भ में बच्चे की हलचल पता चलने लगती है और चौंबीसवें हफ्ते में यह हलचल और बढ़ जाती है। बच्चा जब पेट में लात मारता है तो मां को बहुत खुशी होती है लेकिन अगर बच्चा कोई हलचल न कर रहा हो तो क्या होगा। मां दो घंटे में दस बार बच्चे के लात मारने का अनुभव करती है जिससे पता चलता है कि भ्रूण एकदम स्वस्थ है। लेकिन हलचल कम महसूस हो रही हो तो तुरंत इसकी जांच करानी चाहिए क्योंकि यह इस बात का संकेत है कि भ्रूण सही स्थिति में नहीं है।

12. मॉर्निंग सिकनेस की कमी :
प्रेगनेंसी के दौरान ज्यादातर महिलाएं पहली तिमाही तक मार्निंग सिकनेस का अनुभव करती है। लेकिन कुछ महिलाएं शुरूआत में मार्निंग सिकनेस का अनुभव नहीं करती हैं। हालांकि कुछ महिलाओं में एचसीजी का स्तर कम हो जाने से अचानक मार्निंग सिकनेस कम हो जाता है जो गर्भपात का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति आने पर बेहतर है कि आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

13. बुखार :
प्रेगनेंसी के दौरान बुखार को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह कभी-कभी बैक्टीरियल या वायरल इंफेक्शन पैदा कर देता है जिससे बच्चे के विकास में बाधा उत्पन्न होने लगती है। बुखार आने पर होने वाली मां को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसका भ्रूण सुरक्षित है या नहीं और अपने और बच्चे के स्वास्थ्य को प्रभावित किए बिना बुखार ठीक करने का उपाय करना चाहिए। कुछ महिलाओं में बुखार को गर्भपात का संकेत माना जाता है इसलिए बुखार आने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं।

14. ब्रेस्ट का आकार घटना :
प्रेगनेंसी के शुरूआत में ही महिला के पूरे शरीर में परिवर्तन दिखने लगता है। इनमें से महिला का ब्रेस्ट शरीर का वह भाग है जो हार्मोन में परिवर्तन होने पर वह ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। जैसे जैसे भ्रूण बढ़ता है ब्रेस्ट ज्यादा भारी और बड़े दिखने लगते हैं। लेकिन ब्रेस्ट का आकार अचानक छोटा दिखने लगे तो शरीर अधिक समय तक बढ़ते हुए भ्रूण को संभालने में सक्षम नहीं हो पाता है। जब प्रेगनेंसी रूक जाती है तो हार्मोन अपनी पुरानी अवस्था में लौट आता है जिससे ब्रेस्ट के आकार कम होने लगता है।



Click it and Unblock the Notifications