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Maa Chandraghanta Mantra, Puja Vidhi: जानें माता चंद्रघंटा की पूजा विधि, भोग, कथा, मंत्र और आरती
Shardiya Navratri Day 3 Chandraghanta Mata Ki Puja Vidhi: शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व है। देवी दुर्गा का यह रूप शांति, साहस और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। चंद्र के आकार की स्वर्णमयी घंटा को अपने मस्तक पर धारण करने के कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनका यह स्वरूप शांत और सौम्य होते हुए भी दुष्टों का नाश करने में अत्यंत शक्तिशाली है।
माता चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों को साहस, आत्मविश्वास और ऊर्जा प्राप्त होती है। यह पूजा साधक के भीतर के भय को समाप्त करती है और उसे मानसिक शांति प्रदान करती है। जिन लोगों के जीवन में अस्थिरता, डर या नकारात्मक ऊर्जा होती है, उनके लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी होता है।

माता चंद्रघंटा की आराधना से व्यक्ति के मन में संतुलन, धैर्य और स्थिरता आती है। इस दिन भक्तगण दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और माता से सुख-समृद्धि, शांति, और सुरक्षा की कामना करते हैं। देवी चंद्रघंटा की कृपा से साधक की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और वह सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त होता है।
चंद्रघंटा माता की पूजा का मुहूर्त (Chandraghanta Mata Ki Puja Muhurat 2024)
शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा करने के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 46 मिनट से लेकर 12 बजकर 33 मिनट तक रहेगा।
मां चंद्रघंटा की पूजा विधि (Chandra Ghanta Mata Ki Puja Vidhi)
मां चंद्रघंटा की पूजा शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन की जाती है। इस दिन पूजा विधि में भक्तगण देवी को शांति और साहस का प्रतीक मानकर श्रद्धा से आराधना करते हैं। पूजा की विधि निम्नलिखित है:
1. स्नान और स्वच्छता: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को शुद्ध करें।
2. कलश स्थापना: पूजा स्थल पर कलश की स्थापना करें और देवी का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें।
3. मां चंद्रघंटा का ध्यान: देवी का ध्यान करके 'ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः' मंत्र का जाप करें।
4. पूजन सामग्री: देवी को लाल या पीले फूल, अक्षत, धूप, दीपक, और चंदन अर्पित करें।
5. मिष्ठान्न और फल: मां को मिठाई और फलों का भोग लगाएं।
6. आरती और दुर्गा सप्तशती का पाठ: देवी की आरती करें और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। इस पूजा से शांति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
मां चंद्रघंटा पूजा मंत्र
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता.
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता
या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:।।
ऐं श्रीं शक्तयै नम:
माता चंद्रघंटा की कथा
प्रचलित कथा के अनुसार, माता दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का अवतार तब लिया था जब दैत्यों का आतंक बढ़ने लगा था। उस समय महिषासुर का भयंकर युद्ध देवताओं से चल रहा था। महिषासुर देवराज इंद्र का सिंहासन प्राप्त करना चाहता था। वह स्वर्ग लोक पर राज करना चाहता था और अपनी इसी इच्छा को पूरा करने के लिए वह युद्ध कर रहा था। जब देवताओं को उसकी मंशा का पता चला तो वे परेशान हो गए और भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सामने जा पहुंचे। ब्रह्मा, विष्णु और महेश देवताओं की बात सुन बहुत क्रोधित हुए। क्रोध आने पर उन तीनों के मुख से ऊर्जा निकली। उस ऊर्जा से एक देवी अवतरित हुईं। उस देवी को भगवान शंकर ने अपना त्रिशूल, भगवान विष्णु ने अपना चक्र, इंद्र ने अपना घंटा, सूर्य ने अपना तेज और तलवार और सिंह प्रदान किया। इसके बाद मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध कर देवताओं की रक्षा की।
मां चंद्रघंटा आरती
जय मां चंद्रघंटा सुख धाम,
पूर्ण कीजो मेरे काम।
चंद्र समान तू शीतल दाती,
चंद्र तेज किरणों में समाती।
क्रोध को शांत बनाने वाली,
मीठे बोल सिखाने वाली।
मन की मालक मन भाती हो,
चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।
सुंदर भाव को लाने वाली,
हर संकट मे बचाने वाली।
हर बुधवार जो तुझे ध्याये,
श्रद्धा सहित जो विनय सुनाय।
मूर्ति चंद्र आकार बनाएं,
सन्मुख घी की ज्योत जलाएं।
शीश झुका कहे मन की बाता,
पूर्ण आस करो जगदाता।
कांची पुर स्थान तुम्हारा,
करनाटिका में मान तुम्हारा।
नाम तेरा रटू महारानी,
'भक्त' की रक्षा करो भवानी।।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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