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इलाज के दौरान ही हार्ट फेल होने से चली जाती है 23 प्रतिशत लोगों की जान
भारत में 23 प्रतिशत मरीज़ ऐसे होते हैं जो दिल के दौरे का पता चलने के साल भर के अन्दर मर जाते हैं, एक खोज से पता चलता है, और यह भी पता चलता है कि यह देश अफ्रीका के दर 34 प्रतिशत, के बाद दूसरे नंबर पर है।
पता चलने के साल भर के अन्दर मरने वालों में 46 प्रतिशत दिल के दौरे से मरते हैं और 16 प्रतिशत दूसरे कारणों से, यह छः भूभाग के पहले गहन अध्ययन के बाद पता चलता है।

इंटरनेशनल कंजेस्तिव हार्ट फेलियर द्वारा अध्ययन से यह पता चला कि दक्षिणीपूर्वी एशिया में दिल के दौरे से मरने वाले मरीजों की संख्या 15 प्रतिशत है, 7 प्रतिशत चाइना में, 9 प्रतिशत दक्षिणी अमेरिका और पश्चिमी एशिया में, जो भारत की तुलना में काफी कम है।

"भारत में पश्चिमी देशों की तुलना में दिल की बीमारियाँ एक दशक पहले ही शुरू हो जाती हैं। जागरूकता की कमी, काफी ज़्यादा पैसे खर्च करना, और आधारभूत संरचना की कमी ही दिल की बीमारियों का कारण बनती हैं," एम्स के कार्डियोलॉजी के प्रोफेसर सन्दीप मिश्रा का कहना है।
जनसंख्या में जीवन संभावना की गुंजाइश बढ़ने से, दिल की बीमारियाँ काफी ज़्यादा बढ़ रही हैं, कार्डियोलॉजी एक्सपर्ट का यह भी कहना था कि भारत जैसे कम पूँजी देश में मृत्यु संख्या में विभिन्नता का श्रेय आधारभूत हेल्थ केयर सुविधा की कमी को दिया जा सकता है। इस शोध से साल भर में भारत, अफ्रीका, चाइना, मिडिल ईस्ट, साउथ ईस्ट एशिया और साउथ अमेरिका में मरने वाले मरीजों की मृत्यु दर को परखा गया। इस शोध में करीबन 108 केंद्र के 5,823 मरीज़ को एनरोल किया गया। मरीजों का फॉलो अप एनरोलमेंट से छः महीने से लेकर साल भर के बीच लिया गया। इन मरीजों की उम्र 59 वर्ष थी और मर्द औरत का अनुपात 60:40 था।
इस शोध का मुख्य उद्देश्य था साल भर के अन्दर मरने के दर के कारणों को जानना। एम्स द्वारा पहले किये गए शोध जो प्रैक्टिस ऑफ़ कार्डियोवैस्कुलर साइंसेज नामक पत्रिका में छपा था कि देर से बिमारी के बारे में पता चलने से एक तिहाई मरीज़ हॉस्पिटल में भर्ती वक़्त ही डीएम तोड़ देते हैं और एक चौथाई मरीज़ बिमारी के पता चलने के तीन महीने के अन्दर मर जाते हैं। समाज को जागरूक होने की अपील करते हुए मिश्रा ने कहा कि कई भारतीय दिल के दौरे और ह्रदय गति के रुकने में अंतर नहीं समझ पाते, जिसके कारण वह डॉक्टर को कंसल्ट नहीं करते।

"ह्रदय गति का रुकना वह स्थिति होती है जहाँ ह्रदय की ब्लड पंप करनी के क्षमता कम हो जाती है, जबकि दिल के दौरे में ह्रदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियां अपना काम करना काफी कम कर देती हैं। ह्रदय गति का रुकना काफी खतरनाक हो सकता है और अगर इसे नज़रंदाज़ किया गया तो यह जानलेवा भी हो सकता है," मिश्रा ने दिल की बीमारियों से सम्बंधित बातें करते हुए आईएएनएस से कहा।
अंतर्राष्ट्रीय हेल्थ संस्था के अनुसार, दिल का दौरा देश विदेश में करीबन 60 मिलियन लोगों पर असर करती है। मरीजों में दिल के दौरे से मरने के रिस्क की तुलना एडवांस्ड कैंसर से किया जा सकता है। हर साल विदेशी अर्थव्यवस्था का 108 डॉलर इसमें खर्च होता है। हालांकि, दिल का दौरा किसी भी उम्र में आ सकता है, पर यह 65 साल से ऊपर के लोगों में आम बात है।
इसके कारण उच्च रक्तचाप, पहले पड़ा दिल का दौरा, दिल का आकार बड़ा होना और मधुमेह हो सकता है। मिश्रा का कहना था कि लोगों में दिल के दौरे को लेकर जागरूकता की कमी इसलिए है क्यूंकि लोग इसे बुढ़ापे की निशानी मानने लगते हैं।
"हालांकि, दिल के दौरे का कोई इलाज नहीं है, पर जिन लोगों में यह पहले पता चल जाता है, उन्हें इलाज को फॉलो करना चाहिए और अपनी दिनचर्या में बदलाव लाना चाहिए ताकि वह ज़्यादा दिन तक जीयें, अच्छा महसूस करें और सक्रीय रहे। इसलिए यह ज़रूरी है कि मरीज़ और उनकी देखभाल करने वाले दिल के दौरे के लक्षणों को पहचानें, ताकि इसका इलाज जल्द से जल्द कराया जा सके," मिश्रा ने कहा।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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