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Sheetala Saptami Vrat Katha: शीतला सप्तमी के दिन जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, मिलेगा आरोग्य का आशीर्वाद
Sheetala Saptami Vrat Katha: चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को शीतला सप्तमी का पर्व मनाया जाता है। यह त्योहार इस साल 10 मार्च 2026, मंगलवार को मनाया जाएगा। यह दिन आरोग्य की देवी, शीतला माता को समर्पित होता है। मान्यता है इस दिन शीतला माता की श्रद्धापूर्वक पूजा और व्रत करने से चेचक, बुखार, फोड़े-फुंसी और अन्य संक्रामक बीमारियां नहीं होती हैं। महिलाएं अपने बच्चों और परिवार के अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखती हैं। इस दिन मां शीतला को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। शीतला सप्तमी के दिन पूजा और व्रत करने से सभी रोगों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। वहीं, शीतला सप्तमी की पूजा करते समय व्रत कथा पढ़ने और सुनने का भी विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस कथा के बिना माता की पूजा अधूरी रहती है। ऐसे में, आइए जानते हैं शीतला सप्तमी की व्रत कथा -

शीतला सप्तमी की व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में एक ब्राह्मण दंपति रहता था। उनके दो बेटे और दो बहुएं थीं। काफी समय बाद दोनों बहुओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। इसी बीच शीतला अष्टमी का त्योहार आया। शीतला अष्टमी के नियमा के अनुसार, इस दिन घर में एक दिन पहले भोजन बनाकर रखा जाता है और अगले दिन ठंडा भोजन किया जाता है। लेकिन दोनों बहुओं को चिंता होने लगी कि अगर वे ठंडा खाना खाएंगी तो कहीं वे बीमार न पड़ जाएं। उनके बच्चे भी छोटे थे, इसलिए उन्हें डर लग रहा था कि कहीं बच्चों की तबीयत खराब न हो जाए।
ऐसे में, उन दोनों ने चुपचाप अपने खाना खाने के लिए दो बाटियां पशुओं के दाना देने वाले बर्तन में बनाकर तैयार कर ली। इसके बाद दोनों बहुएं अपनी सास के साथ शीतला माता की पूजा करने गईं और वहां माता की कथा सुनी। पूजा से लौटने के बाद सास शीतला माता के भजन गाने में लग गईं। वहीं, दोनों बहुएं बच्चों के रोने का बहाना बनाकर घर आ गईं। घर आकर उन्होंने पशुओं के बर्तन से गरम-गरम बाटियां निकालकर खा लीं। थोड़ी देर बाद जब सास घर वापस आई तो उसने बहुओं को बुलाकर ठंडा भोजन करने के लिए कहा। तब दोनों बहुओं ने सबके सामने ठंडा भोजन भी कर लिया और फिर अपने-अपने काम में लग गईं। कुछ समय बाद सास ने कहा कि बच्चे काफी देर से सो रहे हैं, उन्हें उठाकर खाना खिला दो।
दोनों बहुएं अपने मृत बच्चों को लेकर घर से निकल पड़ीं। चलते-चलते वे एक पुराने खेजड़ी के वृक्ष के पास पहुंचीं। उस वृक्ष के नीचे ओरी और शीतला नाम की दो बहनें बैठी थीं। उनके सिर में बहुत सारी जुएं थीं, जिससे उन्हें काफी परेशानी हो रही थी। थकी हुई दोनों बहुएं उनके पास बैठ गईं और दया करके उनके सिर से जुएं निकालने लगीं। जब जुएं खत्म हो गईं तो ओरी और शीतला को बहुत राहत मिली। उन्होंने कहा कि तुम दोनों ने हमारे मस्तक को शीतल ठंडा किया है। वैसे ही तुम्हें पेट की शांति मिले।
इतने पर दोनों बहुओं ने दुखी होकर कहा कि हम अपने बच्चों को लेकर भटक रही हैं, लेकिन अभी तक हमें शीतला माता के दर्शन नहीं हुए। यशीतला माता ने कहा कि तुन दोनो से पाप किया है, तुम दुष्ट हो, दुराचारिणी हो, तुम्हारा तो मुंह तक देखने योग्य नहीं है। शीतला सप्तमी के दिन ठंडा भोजन करने के बदले तुम दोनों ने गरम भोजन कर लिया था।इसलिए यह सब हुआ है।
यह सुनते ही बहुओं ने शीतला माता को पहचान लिया और दोनों ने तुरंत माता के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और कहा कि हमने अज्ञानता में गलती कर दी। आगे से हम कभी ऐसा नहीं करेंगे।
उनकी सच्ची पश्चाताप देखकर शीतला माता प्रसन्न हो गईं। माता ने कृपा करके दोनों बच्चों को फिर से जीवित कर दिया। इसके बाद दोनों बहुएं अपने बच्चों को लेकर गांव लौट आईं। जब गांव वालों को यह बात पता चली कि शीतला माता ने उनको दर्शन दिए हैं तो लोगों ने बहुत धूमधाम से उनके स्वागत किया। गांव के लोगों ने मिलकर वहां शीतला माता का मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। शीतला माता ने जैसे उन दोनों बहुओं पर अपनी कृपा दृष्टि रखी वैसी हर किसी पर रखें।



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