Bakrid 2025 : हलाल करने से पहले क्यों गिने जाते हैं बकरे के दांत, कुर्बानी से जुड़ी है वजह

Qurbani Rules in Islam : बकरा ईद, जिसे ईद-उल-अजहा कहा जाता है, इस्लाम धर्म के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। यह त्योहार त्याग, समर्पण और भक्ति की भावना का प्रतीक माना जाता है। इस साल भारत में 7 जून 2025 को बकरीद मनाई जाएगी। तारीख की पुष्टि चांद दिखने के बाद की गई है।

बकरीद, ईद-उल-फितर के दो महीने और नौ दिन बाद, इस्लामिक कैलेंडर के बारहवें महीने जिल-हिज्जा की 10वीं तारीख को मनाई जाती है।

Qurbani Rules in Islam

क्यों गिने जाते हैं बकरे के दांत?

अधिकतर लोग जानते हैं कि बकरीद पर जानवर की कुर्बानी दी जाती है, लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि कुर्बानी से पहले बकरे के दांत गिने जाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि उसकी उम्र का सही आकलन किया जा सके।
शरीयत के अनुसार, कुर्बानी के लिए कम से कम एक साल का बकरा होना चाहिए। एक साल के बकरे के 4 से 6 दांत निकल आते हैं। अगर इससे कम दांत हैं, तो माना जाता है कि बकरा अभी नाबालिग है और उसकी कुर्बानी जायज नहीं है। वहीं, यदि सभी दांत गिर चुके हैं और बकरा बहुत बूढ़ा हो गया है, तो उसकी कुर्बानी भी अमान्य मानी जाती है। यानी बकरीद पर न नवजात और न ही वृद्ध बकरे की कुर्बानी दी जाती है।

कुर्बानी के पीछे कुरआन की सोच

कुरआन के अनुसार, कुर्बानी का असली मकसद ईश्वर के प्रति भक्ति और नीयत का प्रदर्शन है। सूरा हज (22:37) में कहा गया है:

"अल्लाह तक न उनका गोश्त पहुंचता है और न खून, बल्कि उसकी ओर तो तुम्हारा तक़वा (धार्मिक भावना) पहुंचता है।"

इसका अर्थ है कि अल्लाह के दरबार में जानवर की कुर्बानी से ज़्यादा महत्व हमारी नीयत और ईमानदारी को दिया जाता है।

कैसा होना चाहिए कुर्बानी का बकरा?

इस्लामी शरीयत के अनुसार, बकरा चुनते समय निम्न बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है:

उम्र (Age): बकरे की आयु कम से कम एक साल होनी चाहिए। उससे कम उम्र का बकरा कुर्बानी के लायक नहीं होता।

स्वास्थ्य (Health): बकरा पूरी तरह से स्वस्थ होना चाहिए। बीमार, बहुत दुबला-पतला, अंधा, या लंगड़ा बकरा कुर्बानी के योग्य नहीं होता।

शारीरिक दोष (Defects): अगर बकरे में कोई बड़ा शारीरिक दोष है, जैसे- सिंग का टूटना, आंख या कान का न होना, पूंछ कट जाना आदि, तो उसकी कुर्बानी अमान्य होगी।

खस्सी बकरा (Castrated Goat): खस्सी बकरे की कुर्बानी शरीयत के अनुसार जायज है, क्योंकि इसका मांस ज़्यादा स्वादिष्ट और कोमल होता है।

दांत (Teeth): बकरे के दांत मजबूत, पूरे और स्वस्थ होने चाहिए। अगर बकरा चारा नहीं खा सकता या उसके सभी दांत टूट चुके हैं, तो वह कुर्बानी के लायक नहीं है।

कब की जाती है कुर्बानी?

कुर्बानी ईद-उल-अजहा की नमाज के बाद की जाती है और यह 10वीं, 11वीं और 12वीं जिलहिज्जा को की जा सकती है। हालांकि, पहले दिन की कुर्बानी को सबसे अफज़ल माना जाता है।

कुर्बानी किन पर फर्ज है?

कुर्बानी उन सभी मुसलमानों पर फर्ज मानी जाती है:
- जो बालिग हों
- आर्थिक रूप से सक्षम हों
- जिनके पास निसाब (शरई धन सीमा) के बराबर या उससे अधिक संपत्ति हो

Story first published: Friday, June 6, 2025, 19:16 [IST]
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