Latest Updates
-
AC कोच बना 'हनीमून सुइट', फूलों-गुब्बारों से सजाया ट्रेन का डिब्बा, वायरल हुआ वीडियो, जानें रेवले के नियम -
Kiara Advani ने यश संग 'तबाही' में दिए दिए इंटीमेट सीन, जानें कैसे शूट किए जाते हैं बोल्ड सीन? -
एक्टर राजेश शर्मा को जहरीले कीड़े ने काटा, हालत नाजुक, जानें मानसून में क्यों बढ़ता है सांप कीड़ों का खतरा -
Yogini Ekadashi 2026: कब रखा जाएगा योगिनी एकादशी का व्रत? इस दिन भूलकर भी न करें ये 5 काम -
Varalakshmi Vrat 2026: सावन के आखिरी शुक्रवार को करें ये 5 उपाय, मां लक्ष्मी बरसाएंगी धन-दौलत -
पंजाब की पहली महिला ड्राइवर और पायलट थीं शेफ विकास खन्ना की मां बिंदु खन्ना, राजीव गांधी के साथ ली थी ट्रेनिंग -
बारिश के मौसम में भूलकर भी फ्रिज में न रखें ये 5 फल, सेहत को हो सकता है नुकसान -
Sapne Me Aam Dekhna: सपने में आम दिखना शुभ या अशुभ? जानें इसका मतलब -
अब WhatsApp पर ही आसानी से बनवा सकते हैं आयुष्मान कार्ड, जानें स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस -
Birthday Special: पड़ोसन को घर से भगा ले गए थे सौरव गांगुली, फिर दोबारा करनी पड़ी थी शादी
Chandra Grahan 2025: ग्रहण पर भी खुले रहते हैं इन मंदिरों के कपाट, नहीं लगता है सूतक काल, जानें वजह
These 4 Temples Do Not Close During Chandra Grahan : हिंदू धर्म में ग्रहण को एक विशेष और संवेदनशील घटना माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में सूर्य और चंद्र ग्रहण को अशुभ काल बताया गया है। इस दौरान मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और पूजा-पाठ स्थगित कर दिया जाता है। सूतक काल, जो चंद्र ग्रहण से 9 घंटे पूर्व प्रारंभ हो जाता है, में भी यही नियम लागू रहते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि इस समय में वातावरण नकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित होता है, इसलिए भगवान की पूजा करना या मंदिर में प्रवेश करना उचित नहीं है।
लेकिन भारत की आस्था और परंपराएं बेहद विविध हैं। यही कारण है कि देश में ऐसे कुछ मंदिर भी हैं, जहां ग्रहण के दौरान कपाट बंद नहीं होते और पूजा-अनुष्ठान भी जारी रहते हैं। इन मंदिरों से जुड़ी मान्यताएं और कथाएं न केवल रोचक हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि आस्था कितनी गहराई से हमारे जीवन में रची-बसी है। आइए जानते हैं उन 4 पवित्र मंदिरों के बारे में।

1. विष्णुपद मंदिर, गया (बिहार)
बिहार के गया जिले में स्थित विष्णुपद मंदिर, पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह माना जाता है कि यहां भगवान विष्णु के चरणचिह्न स्थापित हैं। ग्रहण काल में जब देशभर के मंदिरों के कपाट बंद हो जाते हैं, तब भी विष्णुपद मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है।
इस मंदिर की मान्यता और भी बढ़ जाती है क्योंकि यहां ग्रहण के समय पितरों को पिंडदान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। सूतक काल में भी यहां श्रद्धालु मंदिर परिसर में विशेष अनुष्ठान करते हैं और भगवान विष्णु के चरणों में पिंडदान अर्पित करते हैं। कहा जाता है कि ग्रहण के समय किया गया पिंडदान सौगुना फल देता है। यही कारण है कि यहां ग्रहण काल में भी मंदिर का दरवाज़ा भक्तों के लिए खुला रहता है।
2. महाकाल मंदिर, उज्जैन (मध्यप्रदेश)
मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे अद्वितीय महत्व प्राप्त है। देशभर में ग्रहण के समय मंदिर बंद करने की परंपरा है, लेकिन महाकाल मंदिर में ऐसा नहीं होता। ग्रहण के दौरान भी मंदिर के दर्शन सामान्य रूप से होते रहते हैं।
हालांकि, यहां पूजा-पाठ और आरती के समय में बदलाव कर दिया जाता है। ग्रहण लगते ही नियमित आरती रोक दी जाती है और ग्रहण समाप्त होने के बाद विशेष शुद्धिकरण और भव्य आरती संपन्न की जाती है। भक्तों का विश्वास है कि इस समय महाकाल के दर्शन मात्र से सारे दोष दूर हो जाते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
3. लक्ष्मीनाथ मंदिर, बीकानेर (राजस्थान)
राजस्थान के बीकानेर का प्राचीन लक्ष्मीनाथ मंदिर भी उन चुनिंदा मंदिरों में शामिल है, जिनके कपाट ग्रहण के समय बंद नहीं होते। इस मंदिर से जुड़ी एक अद्भुत कथा प्रचलित है।
कहा जाता है कि एक बार सूतक लगने पर मंदिर के पुजारी ने कपाट बंद कर दिए थे। उस रात भगवान ने बालक का रूप धारण किया और पास ही हलवाई की दुकान पर जाकर भोजन मांगा। बालक ने बदले में अपनी पाजेब दी और हलवाई से प्रसाद ले लिया। अगली सुबह जब मंदिर खोला गया तो भगवान के चरणचिह्न गायब थे। हलवाई ने पुजारी को पूरी घटना बताई। तब से यह मान्यता बन गई कि लक्ष्मीनाथ जी ग्रहण के समय भी पूजा चाहते हैं। इस कारण मंदिर के कपाट अब कभी भी ग्रहण में बंद नहीं होते और पूजा-पाठ लगातार चलते रहते हैं।
4. तिरुवरप्पु कृष्ण मंदिर, कोट्टायम (केरल)
केरल के कोट्टायम जिले में स्थित तिरुवरप्पु श्रीकृष्ण मंदिर ग्रहण के समय भी खुला रहता है। यहां की मान्यता बेहद अनोखी है। कहा जाता है कि एक बार ग्रहण के समय जब मंदिर बंद कर दिया गया, तो अगली सुबह भगवान कृष्ण की मूर्ति पतली हो गई थी और कमर पर बंधी पट्टी नीचे खिसक गई थी।
भक्तों ने इसे भगवान की भूख का परिणाम माना। तब से इस मंदिर में ग्रहण के दौरान भी भगवान को भोग अर्पित किया जाता है और पूजा-अनुष्ठान जारी रहते हैं। लोगों का विश्वास है कि यहां के श्रीकृष्ण सदैव अपने भक्तों के लिए सजीव हैं और भूख लगने पर वे इसे मूर्ति में भी प्रकट कर देते हैं।



Click it and Unblock the Notifications