क्या आप जानते हैं क्यों लगता है सूर्य ग्रहण? जान लें इसकी पौराणिक और रोचक कहानी

Surya Grahan Pauranik Katha In Hindi: 21 सितंबर 2025 को साल का सबसे लंबा सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है। हालांकि ये भारत में दिखाई नहीं देगा और न ही इसका सूतक काल भारत में मान्य होगा। सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को हम आमतौर पर केवल खगोलीय घटनाओं के रूप में देखते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे छुपा है एक प्राचीन पौराणिक रहस्य जिसमें देवता, असुर और अमृत की कहानी जुड़ी हुई है? जी हां, हम बात कर रहे हैं समुद्र मंथन से लेकर मोहिनी अवतार तक, और राहु-केतु की चालाकियों से लेकर सूर्य और चंद्र के ग्रहण तक के बारे में। इस कहानी में है रोमांच, छल और दिव्यता का अद्भुत मिश्रण।

आइए जानते हैं वह रहस्य, जो हर ग्रहण के पीछे छुपा है। चलिए फिर जल्दी से जान लेते हैं सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के पीछे की रोचक और पौराणिक कहानी।

सूर्य ग्रहण की रोचक और पौराणिक कथा

माना जाता है कि सूर्य ग्रहण की कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि देवताओं और असुरों के बीच जब समुद्र मंथन हुआ तो उसमें से 14 रत्न निकले। अंत में अमृत कलश प्रकट हुआ। अमृत पीने वाला अमर हो जाता, इसलिए इसे लेकर देवताओं और असुरों के बीच बड़ा विवाद हुआ। ऐसे में सभी दैत्यों और देवताओं के बीच अमृत चखने की होड़ लग गई। दैत्य हर संभव कोशिश करने लगे कि वो अमृत का सेवन करें और देवताओं की परेशानी बढ़ गई। इस समस्या का हल निकालने के लिए और देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। मोहिनी रूप देखकर असुर मोहित हो गए। विष्णु जी ने अमृत को देवताओं में बांटना शुरू किया और असुरों को छलपूर्वक वंचित कर दिया।

Surya Grahan Pauranik Katha In Hindi

राहु का छल

विष्णु के मोहिनी अवतार के बाद राहु नाम के दैत्य ने चालाकी से अमृत पान करने के लिए देवताओं की पंक्ति में बैठने का निश्चय किया। जैसे ही वो अमृत चखने लगा तो चंद्र और सूर्य देव ने उसे पहचान लिया और मोहिनी रूपी विष्णु को बता दिया। विष्णु जी ने तुरंत अपना सुदर्शन चक्र चलाकर राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन तब तक उसने अमृत पी लिया था। इस वजह से उसका सिर (राहु) और धड़ (केतु) बन गया और दोनों अमर हो गए। कहा जाता है कि तभी से राहु और केतु देवताओं के शत्रु बन गए।

क्यों लगता है ग्रहण?

राहु ने शत्रुता के कारण सूर्य और चंद्र को निगलने का संकल्प लिया, क्योंकि उन्हीं की वजह से उसका रहस्य खुला था। जब राहु सूर्य को निगलता है तो सूर्य ग्रहण लगता है और जब वह चंद्र को निगलता है तो चंद्रग्रहण लगता है। हालांकि राहु केवल उन्हें निगलने की कोशिश करता है, लेकिन उनका अस्तित्व अमर होने से वह उन्हें पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाता। इसी कारण कुछ समय बाद सूर्य और चंद्र फिर से मुक्त हो जाते हैं।

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