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जब तवायफों ने संभाला था आजादी की लड़ाई का मोर्चा, कोठों पर होती थी बैठकें, गुप्तचर बनकर लाती थीं खबरें
Unsung Heroes of India: आज़ादी वो अहसास है जो हर मनुष्य के लिए मूलभूत होती है। इतिहास गवाह है कि हर समाज हर देश के लोगों ने अपनी आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। भारत की आज़ादी की लड़ाई में भी समाज के हर तबकों ने अपना अपना योगदान दिया था।
महात्मा गांधी, भगत सिंह, रानी लक्ष्मी बाई ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपने समर्पण से ना केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाई बल्कि भारतीय इतिहास के पन्नों पर अपना नाम हमेशा के लिए सुनहरे अक्षरों से लिखवा दिया। हालांकि कुछ ऐसे लोग भी रहें जिनका योगदान भी अमूल्य रहा लेकिन इतिहास के शोरगुल में उनका नाम गुमनामी में कही दब गया।

ऐसा ही एक तबका था भारतीय तवायफों का जिन्होंने अपनी क्षमता अनुसार अंग्रेजों के खिलाफ़ चल रही लड़ाई में अपना योगदान दिया। जानते हैं ऐसी ही तवायफों के बारे में विस्तार से -
अंग्रेजों के खिलाफ जब तवायफों ने संभाला था मोर्चा
अजीज़ुनबाई लखनऊ घराने से थीं जो कम उम्र में ही कानपुर चली गयीं थीं। वे एक जासूस, एक लड़का और खबरी थी। वे ब्रिटिश इंडियन आर्मी के करीब थीं जिससे उन्हें उनकी सारी रणनीतियों के बारे में पता चल जाता था। साथ ही उन्होंने एक योद्धा जैसे घुड़सवारी और शास्त्र चलाना भी सीखा हुआ था। उनके कोठे पर स्वतंत्रता सेनानियों की बैठकें भी हुआ करती थीं। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार एक जून, 1857 को क्रांतिकारियों ने अजीजुनबाई के कोठे में एक बैठक की। इसमें नाना साहब, तात्या टोपे के साथ सूबेदार टीका सिंह, शमसुद्दीन खां और अजीमुल्ला खान शामिल हुए थे। इसी बैठक में हाथ में गंगाजल लेकर इन सबने अंग्रेजों की हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था। उन्होंने महिलाओं का भी एक समूह बनाया था जो स्वतंत्रता सेनानियों के सन्देश पहुंचने, उनको मरहम पट्टी आदि के कार्य करने में सहयोग देती थीं। उन्होंने परदे के पीछे और जंग के मैदान दोनों जगह से अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ अपनी लड़ाई लड़ी थी।
बेगम हज़रत महल, जो अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी थीं, अपनी शादी से पहले एक वेश्या थीं, ऐसा कुछ विवरण बताते हैं। विद्रोह के दौरान, जब उनके पति को निर्वासित कर दिया गया, तो कुछ समय के लिए भारतीय लड़ाकों ने बेगम के नेतृत्व में ही लखनऊ पर कब्ज़ा किया था।
इसके साथ ही 1920 से 1922 तक गांधी जी के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन के दौरान वाराणसी में कुछ तवायफों ने स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन करने के लिए तवायफ सभा का गठन किया था। इस सभा का नेतृत्व तवाइफ़ हुस्ना बाई द्वारा किया गया। तवायफों ने पूरी एकता के साथ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और अपने गहनें उतारकर लोहें की हथकड़ियाँ पहन ली थी।
हाल ही में आई हीरामंडी वेबसीरीज़ में भी तवाइफों द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ़ की लड़ाई में दिए गए योगदानों को बेहद बखूबी से दिखाया गया है। अलग अलग ऐतिहासिक शोध पत्रों और पुस्तकों में भारत के विभिन्न हिस्सों में तवायफों द्वारा आजादी के संघर्ष में दिए त्याग के बारे में उल्लेख किया गया है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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