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Kartik Purnima Vrat Katha: कार्तिक पूर्णिमा के दिन पढ़ें ये व्रत कथा, जीवन में आएगी सुख-समृद्धि
Kartik Purnima Vrat Katha In Hindi: हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है। यह पूर्णिमा पूरे वर्ष में आने वाली सभी पूर्णिमाओं में सबसे पवित्र मानी जाती है। इस साल कार्तिक पूर्णिमा 5 नवंबर 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने के बाद दान व दीपदान करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। मान्यता है कि इस दिन देवताओं ने स्वयं दीपावली मनाई थी, इसलिए इसे देव दीपावली कहा जाता है। कार्तिक पूर्णिमा पर श्रद्धालु देवी-देवताओं का पूजन करते और मनोवांछित फल प्राप्त करने के लिए व्रत भी रखते हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन स्नान, दान, व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और उसके जीवन के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि इस दिन व्रत कर रहे हैं, तो पूजा करने के बाद यह व्रत कथा जरूर पढ़ें।

कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय धरती और स्वर्ग में तारकासुर नामक राक्षस ने अत्याचार मचा रखा था। देवता अत्यंत दुखी होकर भगवान शिव के पास पहुंचे और उनसे प्रार्थना की कि वे इस दानव से मुक्ति दिलाएं। भगवान शिव ने तारकासुर का वध कर दिया, जिससे देवताओं ने राहत की सांस ली।
तारकासुर के तीन पुत्र थे- तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। उसके तीनों पुत्रों को अपने पिता की मृत्यु से क्रोधित हुए। उन्होंने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या कर अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि कोई दूसरा वर मांगें। तब तीनों ने कहा कि उनके लिए तीन नगर बनाए जाए, एक स्वर्ण का, एक रजत (चांदी) का और एक लौह (लोहे) का, जिसमें सभी बैठकर सारी पृथ्वी और आकाश में घूम सकें। उन्होंने यह भी शर्त रखी कि एक हजार वर्ष बाद जब हम मिलें और ये तीनों नगर मिलकर एक हो जाएं और उसी समय यदि कोई देवता एक ही बाण से उन्हें नष्ट कर सके, तभी उनकी मृत्यु संभव हो। ब्रह्माजी ने उन्हें ये वरदान दे दिया।
ब्रह्माजी के कहने पर मयदानव ने उनके लिए तीन नगरों का निर्माण किया। तारकाक्ष के लिए सोने का, कमलाक्ष के लिए चांदी का और विद्युन्माली के लिए लोहे का नगर बनाया गया। इन तीनों नगरों के कारण राक्षसों ने पुनः त्रिलोक में आतंक मचाना शुरू कर दिया। तब इंद्र देवता इन तीनों राक्षसों से भयभीत हुए और भगवान शंकर की शरण में गए। इंद्र की बात सुन भगवान शिव ने इन दानवों का नाश करने के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण करवाया।
इस रथ की हर एक चीज देवताओं से बनी थी। सूर्य और चंद्रमा इसके पहिए बने, हिमालय धनुष बने, शेषनाग उसकी प्रत्यंचा बने, स्वयं भगवान शिव बाण बने और बाण की नोंक बने अग्निदेव। भगवानों से बनें इस दिव्य रथ और तीनों असुर भाइयों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जैसे ही तीनों राक्षसों के नगर एक सीध में आए, तब भगवान शिव ने अपने बाण से उन तीनों नगरों का विनाश कर दिया। तभी से भगवान शिव को त्रिपुरारी या त्रिपुरांतक कहा जाने लगा।



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