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मोक्षदा एकादशी व्रत में जरूर पढ़ें ये कथा, मिलेगा भगवान विष्णु का आशीर्वाद, पूरी होगी मनोकामना
Mokshada Ekadashi Vrat Katha Or Aarti: मोक्षदा एकादशी हिंदू धर्म के 24 एकादशी व्रतों में से अत्यंत पवित्र और फलदायी मानी जाती है। यह व्रत सिर्फ प्रभु विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए ही नहीं बल्कि जीवन के दुख, कष्ट और पापों से मुक्ति दिलाने वाला भी माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि मोक्षदा एकादशी के दिन पूरे विधि-विधान से व्रत, पूजा और कथा सुनने से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है, पारिवारिक क्लेश दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
ऐसा विश्वास है कि इस व्रत का फल हजारों वर्षों के तप और दान के बराबर होता है। आज हम आपको मोक्षदा एकादशी का महत्व, कथा और आरती बताने जा रहे हैं। जान लें कि इस कथा और आरती के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

मोक्षदा एकादशी का महत्व
माना जाता है कि मोक्षदा एकादशी वह दिन है जब भगवान श्रीहरि विष्णु अपने भक्तों के पाप स्वयं हर लेते हैं और उनके लिए सद्गति व मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसलिए इसे "मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी" भी कहा जाता है। जो भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और कथा श्रवण करते हैं, उन्हें न केवल सांसारिक सुख मिलता है बल्कि पुण्य, समृद्धि और सुखद जीवन का वरदान भी प्राप्त होता है। यही नहीं, इस व्रत से न केवल स्वयं बल्कि पूर्वजों को भी मोक्ष और सद्गति प्राप्त होती है, इसलिए यह व्रत पीढ़ियों का उद्धार करने वाला माना गया है।
मोक्षदा एकादशी व्रत की संपूर्ण कथा
प्राचीन काल में भद्रावती नाम का एक विशाल और समृद्ध राज्य था, जहां वैधृत नाम के परम धर्मी और न्यायप्रिय राजा राज करते थे। उनका राज्य सुख, शांति और समृद्धि से भरा हुआ था। प्रजा राजा से अत्यंत प्रसन्न थी और राजा स्वयं भी धर्म और सत्य की मार्ग पर चलने में विश्वास रखते थे। एक दिन राजा ने रात में एक बहुत विचित्र सपना देखा। उन्होंने देखा कि उनके पिता मृत्यु के बाद नरक की पीड़ा झेल रहे हैं, और अत्यंत दुख में सहायता के लिए पुकार रहे हैं। इस दृश्य से राजा का मन व्याकुल हो गया। सुबह उठते ही राजा ने अपने सपने को राजपुरोहितों व विद्वानों को सुनाया, लेकिन किसी के पास उचित उत्तर नहीं था।
इस समस्या का समाधान ढूंढ़ने के लिए राजा वैधृत पास के पर्वत पर स्थित मुनि पार्वत्य के आश्रम पहुँचे। विनम्रता से प्रणाम कर उन्होंने पूरी बात कही। सब सुनकर मुनि ऋषि ने दिव्य दृष्टि से ध्यान लगाया और कहा- राजन, आपके पिता पूर्व जन्म में न्याय करने में भूल कर बैठे थे और एक ब्राह्मण को कष्ट पहुँचाया था। इसी पाप के कारण वे नरक में यातना भुगत रहे हैं। लेकिन घबराएँ नहीं उन्हें मुक्ति मिल सकती है। राजा ने उतावलेपन से पूछा- गुरुदेव, कृपया मार्ग बताइए जिससे मेरे पिता को नरक से छुटकारा मिल सके।
तब ऋषि पार्वत्य ने कहा- मार्ग एक ही है आने वाली मोक्षदा एकादशी का व्रत कीजिए, भगवान विष्णु की पूजा कीजिए और व्रत का पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दीजिए। इससे उन्हें अवश्य ही स्वर्ग की प्राप्ति होगी। राजा ने पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ मोक्षदा एकादशी का व्रत किया, भगवान विष्णु का पूजन किया और व्रत का समस्त पुण्य अपने पिता को समर्पित किया। व्रत का प्रभाव इतना दिव्य था कि राजा के पिता तुरंत ही नरक से मुक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए। राजा को देवताओं की ओर से संदेश मिला- हे धर्मात्मा राजा! तुमने पिता के साथ न्याय किया है। तुम्हारी भक्ति और श्रद्धा महान है। तब से यह मान्यता है कि मोक्षदा एकादशी व्रत न केवल स्वयं का उद्धार करता है, बल्कि पूर्वजों को भी मोक्ष प्रदान करता है। जो भी व्यक्ति इस दिन सच्चे मन से व्रत, कथा और हरि-स्मरण करता है, उसे भगवान विष्णु की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
मोक्षदा एकादशी आरती
ॐ जय जगदीश हरे
स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट
क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
जो जन ध्यान धरे
स्वामी जो जन ध्यान धरे
पावल वह फल पावे
दुःख विनसे रहे ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
मात-पिता तुम मेरे
स्वामी मात-पिता तुम मेरे
शरण गहूँ मैं किसकी
तुम बिन और न दे ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम पूरन परमात्मा
स्वामी तुम पूरन परमात्मा
बंधु सखा तुम मेरे
मैं तुमको नित्य धरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम दीनन के दाता
स्वामी तुम दीनन के दाता
कर्म प्राणी जीवों के
सदा ही भरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
जो ध्यावे फल पावे
स्वामी जो ध्यावे फल पावे
रोग और शोक मिटे
मन में बसत धरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
ॐ जय जगदीश हरे
स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट
क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥



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