Phulera Dooj Ki Katha: श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम का प्रतीक है फुलेरा दूज, इस कथा से जानें उनका स्नेह

Phulera Dooj Ki Katha: फुलेरा दूज का पावन पर्व भगवान श्री कृष्णा और राधा रानी के प्रेम को समर्पित है। माना जाता है कि फुलेरा दूज के पावन मौके पर भगवान श्री कृष्णा और राधा माता की सच्ची निष्ठा और शुद्ध मन के साथ पूजा अर्चना करता है, उसके प्रेमजीवन में आ रही सभी बाधाएं दूर होती हैं। उनके आशीर्वाद से लव लाइफ में अनुकूलता बनी रहती है।

हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को फुलेरा दूज का त्यौहार मनाया जाता है। हिंदू धर्म में फुलेरा दूज का बहुत ही महत्व है। ऐसा माना जाता है कि फुलेरा दूज के दिन श्रीकृष्ण और राधा रानी ने फूलों की होली खेली थी। वहीं कुछ लोगों की यह भी आस्था है कि फुलेरा दूज के शुभ अवसर पर भगवान श्री कृष्णा और राधा रानी का विवाह संपन्न हुआ था।

Phulera Dooj Ki Katha Read Radha Krishna Heart Touching Love Story in Hindi

फूलों से होली खेलने की परंपरा आज भी चली आ रही है। ब्रज में बड़ी ही प्रसन्नता पूर्वक और उल्लास के साथ फूलों की होली खेली जाती है। इस उत्सव का हिस्सा बनने के लिए दुनियाभर से भक्तगण आते हैं। इस दिन भगवान श्री कृष्णा और राधा रानी का विशेष पूजा अर्चना का विधान है। फुलेरा दूज के पावन पर्व में राधा कृष्ण के दर्शन और पूजा अर्चना करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इस बार फुलेरा दूज 12 मार्च दिन मंगलवार को मनाई जाएगी। फुलेरा दूज के पीछे एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है। आईए जानते हैं फुलेरा दूज की पौराणिक कथा के बारे में।

फुलेरा दूज की कथा (Phulera Dooj Ki Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्री कृष्णा राधा रानी से बहुत दिनों से नहीं मिल पाए। इस बात को सोचकर राधा रानी बहुत उदास रहने लगीं। उनके उदासी देखकर वृंदावन के बाग़ बगीचों के सारे फूल मुरझाने लगे पेड़ पौधे में लगे फलों की डालियां सूखने लगी। पक्षियों ने चहचहाना बंद कर दिया। नदी की धारा स्थिर होने लगी। पूरे वृंदावन में उदासी का माहौल छाने लगा। भगवान श्री कृष्ण से मिलने की चाहत राधा रानी को बहुत ही उदास करने लगी। राधा रानी के साथ गोप ग्वाला भी उदास निराश होने लगी।

राधा रानी भगवान श्री कृष्ण से मिलने की आस में बहुत दिनों तक बैठी रही। राधा जी की चेतना खो गई थी। वह कुछ न खाती न पीती थी। जब भगवान श्री कृष्ण ने यह मंजर देखा तो उन्हें आभास हुआ कि यह सब दशा राधा रानी की वजह से हो रही है। राधा रानी मुझे पुकार रही है और उदास निराश रहती हैं। जिस कारण वृंदावन सुना पड़ गया है। कली मुरझा गई है। इस मंजर को देखते हुए भगवान श्री कृष्ण ने निर्णय लिया कि वह राधा रानी से मिलने जाएंगे और वृंदावन के लिए निकल पड़े। जैसे ही कान्हा जी के आने का सुखद समाचार राधा रानी तथा वृंदावन वासियों को मिला तो राधा रानी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उनका चेहरा प्रसन्न होकर खिल उठा। खुशियों की बहार आ गयी। सबकी रंगत लौट आ गयी। फूल खिलने लगे, पशु पक्षियों में सजीवता आ गयी। पक्षियां चहचहाने लगी । पेड़ पौधे में हरियाली छा गई। सभी गोप ग्वाला खुशी से नाचने लगे।

भगवान श्री कृष्णा से राधा रानी मिलकर बहुत प्रसन्न हुई। इसके पश्चात कान्हा जी ने फूल तोड़कर राधा रानी के ऊपर डाला फिर राधा रानी भी फूल तोड़कर भगवान श्री कृष्ण कन्हैया के ऊपर डाला। यह देखकर ग्वाल बाल और गोपियां भी एक दूसरे के ऊपर फूलों की बरसात करने लगें। वृंदावन में एक त्यौहार और उत्सव का माहौल बन गया। वह शुभ दिन फुलेरा दूज का था। उसी दिन से फूलों की होली खेलने का प्रचलन शुरू हुआ। प्रत्येक वर्ष मथुरा वृंदावन में इसी दिन फूलों की होली खेली जाती है।

नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।

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