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रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की कथा है। ये कथा ज्ञान का समंदर समेटे हुए है। हर चौपाई में ज्ञान है।
कहते हैं इसको पढ़ के आत्मसात कर लिया जाये तो व्यक्ति जीवन में बड़े से बड़ा संकट भी मुस्कुराते हुए झेल लेता है।
आइये हम आपको ऐसी पांच चौपाईयां बताते हैं जिसमें जीवन का सार छुपा है और इसपर अमल करने से जीवन में काफी परिवर्तन आयेगा।

बिनु सत्संग विवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सठ सुधरहिं सत्संगति पाई।
पारस परस कुघात सुहाई॥
इस चौपाई का अर्थ है कि अच्छे लोगों के साथ रहने से ही विवेक मिलता है, बुद्धि खुलती है और जीवन में परिवर्तन आता है। जैसे पारस के संपर्क मात्र से लोहा सोने में बदल जाता है, वैसे ही सत्संग से बुरा इंसान भी अच्छा बन जाता है।
लेकिन ये सत्संग बिना ईश्वर की कृपा से नहीं मिलता हैं। इसलिए सत्संग के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।

जा पर कृपा राम की होई।
ता पर कृपा करहिं सब कोई॥
जिनके कपट, दम्भ नहिं माया।
तिनके ह्रदय बसहु रघुराया॥
इस चौपाई का अर्थ है जिसके साथ ईश्वर होते हैं उसके लिए हर चीज सहायक बन जाती है। जब प्रकृति आपकी सहायक बन जाये तो फिर आपको कौन कष्ट दे सकता है? लेकिन ईश्वर की कृपा सब पर नहीं होती है। ईश्वर की कृपा उन्हीं पर होती है जिनका ह्रदय निर्मल हो और उसमें ईश्वर निवास करते हों। इसलिए ह्रदय को निर्मल रखना चाहिए और इसे कपट, पाखंड और माया से दूर रखना चाहिए।

होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा।
गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥
इस चौपाई से हमें ये शिक्षा मिलती है कि अपना कर्म करते रहो और बाकि सब भगवान् पर छोड़ दो क्योंकि होगा वही जो राम ने रच रखा है। तर्क वितर्क करके मामले को कितना भी पेचीदा और विस्तृत बनाइये लेकिन अंत में होगा वही जो नियति है जो भगवन ने रच रखा है। इसलिए अपना कर्म कीजिये और बाकि सब भगवान् पर छोड़ दीजिये। ये चौपाई कहकर जब भगवान शिव हरि का नाम जपने लगे तब सती वहाँ चली गईं जहाँ सुख के धाम प्रभु राम थे।

करमनास जल सुरसरि परई,
तेहि का कहहु सीस नहिं धरई।
उलटा नाम जपत जग जाना,
बालमीकि भये ब्रह्म समाना।।
गन्दा से गन्दा पानी भी अगर गंगा नदी में समाहित हो जाये तो अब वो गन्दा पानी भी गंगाजल बन जाता है और पवित्र हो जाता है। ये ईश्वर की कृपा है और प्रकृति का नियम। वाल्मीकि तो मरा मरा जपते हुए भी भव सागर से पार हो गये क्योंकि उन्हें राम राम कहने का फल मिला और ब्रह्मर्षि कहलाये। इसलिए ईश्वर की कृपा के लिए कर्म कीजिये, उसके संपर्क में आने के लिए कर्म करने मात्र से जीवन धन्य हो जाता है।

अनुचित उचित काज कछु होई,
समुझि करिय भल कह सब कोई।
सहसा करि पाछे पछिताहीं,
कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।
जैसे नदी की गहराई का अंदाजा जाने बिना उसमें कूदने पर नुकसान हो सकता है, वैसे ही किसी भी कार्य का परिणाम क्या हो सकता है ऐसा सोचे बिना कार्य किया जाये तो हानि होगी। सूर्पनखा की बात पर ठन्डे दिमाग से निर्णय ना लेने और सीता का अपहरण कर लेने की वजह से ही रावण का पतन हो गया। बिना विचारे जो करे सो पीछे पछताय। इस चौपाई से यही शिक्षा मिलती है की उचित या अनुचित परिणाम की गणना किये बिना कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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