Latest Updates
-
कौन हैं कोमल रानी स्वर्णकार? जिनके गोविंदा संग हो रहे अफेयर के चर्चे, जानें दोनों के रिश्ते का पूरा सच -
सूर्य ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाएं क्या करें और क्या नहीं? जानें खाने-पीने और सोने से जुड़े नियम -
Surya Grahan 2026: आज लगेगा साल का सबसे बड़ा सूर्य ग्रहण, दिन में छा जाएगा अंधेरा; जानें भारत में दिखेगा? -
Hariyali Amavasya 2026: क्यों मनाई जाती है हरियाली अमावस्या? जानें स्नान-दान का मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि -
Sawan Shivratri Vrat Katha 2026: सावन शिवरात्रि पर जरूर करें इस व्रत कथा का पाठ, भगवान शिव दूर करेंगे हर संकट -
Happy Sawan Shivratri 2026 Wishes: भोले की भक्ति...सावन शिवरात्रि पर प्रियजनों को भेजें ये खास शुभकामना संदेश -
दिल्ली में बढ़े H1N1 (स्वाइन फ्लू) के मामले, अब तक 1344 केस, ये लक्षण दिखें तो बिल्कुल नजरअंदाज न करें -
सोनू निगम की किस बीमारी के चलते हुई सर्जरी? ऑपरेशन थिएटर में गाया रफी साहब का गीत, वायरल हुआ वीडियो -
Sara Tendulkar: सारा तेंदुलकर बनीं दुल्हन! व्हाइट गाउन और लीफ-कट वेल में दिखा परी जैसा लुक, देखें फोटोज -
Sawan Shivratri 2026: कब है सावन शिवरात्रि? जानें सही तिथि, जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त,पूजा विधि और मंत्र
Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, हर मनोकामना होगी पूरी
Saphala Ekadashi Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को अत्यंत पवित्र और पुण्यकारी माना जाता है। साल भर में कुल 24 एकादशी व्रत पड़ते हैं। वैदिक पंचाग के अनुसार, पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल सफला एकादशी का व्रत 15 दिसंबर 2025 (सोमवार) को रखा जाएगा। यह व्रत भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है। ऐसी मान्यता है कि सफला एकादशी के दिन व्रत कथा का पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। तो आइए, जानते हैं सफला एकादशी की व्रत कथा -

सफला एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल में चम्पावती नगरी में एक महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। उन सबमें लुम्पक नाम वाला बड़ा राजपुत्र महापापी था। वह सदा परस्त्री और वेश्यागमन तथा दूसरे बुरे कामों में अपने पिता का धन नष्ट किया करता था। सदैव ही देवता, बाह्मण, वैष्णवों की निंदा किया करता था। जब राजा को अपने बड़े पुत्र के ऐसे कुकर्मों का पता चला तो उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाल दिया।
राज्य से निकाले जाने के बाद लुम्पक वन में रहने लगा। दिन में वह पशुओं को मारकर खाता और फलों से अपना गुजारा करता था। रात में वह नगर में घुसकर चोरी करता और लोगों को परेशान करता था। कुछ समय पश्चात सारी नगरी भयभीत हो गई। नागरिक और राज्य के कर्मचारी उसे पकड़ लेते किंतु राजा के भय से छोड़ देते। लुम्पक जिस वन में रहता था, वह वन भगवान विष्णु को बहुत प्रिय था। एक बार पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को लुम्पक ने वृक्षों के फल खाए। वस्त्रहीन होने के कारण उसे पूरी रात बहुत अधिक सर्दी लगी और वह ठंड से ठिठुरता रहा, जिसके कारण वह सो नहीं पाया। उसने पूरी रात जागकर बिताई। अगले दिन यानी एकादशी के दिन भी ठंड के कारण लुम्पक बेहोश हो गया।
दूसरे दिन एकादशी को दोपहर के समय सूर्य की गर्मी पाकर उसकी मूर्छा दूर हुई। गिरता-पड़ता वह भोजन की तलाश में निकला। पशुओं को मारने में वह समर्थ नहीं था अत: पेड़ों के नीचे गिर हुए फल उठाकर वापस उसी पीपल वृक्ष के नीचे आ गया। उस समय तक भगवान सूर्य अस्त हो चुके थे। वृक्ष के नीचे फल रखकर कहने लगा- हे भगवन! अब आपके ही अर्पण है ये फल। आप ही तृप्त हो जाइए। उस रात्रि को दु:ख के कारण रात्रि को भी नींद नहीं आई।
उसके इस उपवास और जागरण से भगवान अत्यंत प्रसन्न हो गए और उसके सारे पाप नष्ट हो गए। दूसरे दिन प्रात: एक अतिसुंदर घोड़ा अनेक सुंदर वस्तुअओं से सजा हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे राजपुत्र! श्रीनारायण की कृपा से तेरे पाप नष्ट हो गए हैं। अब तू अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त कर। ऐसी वाणी सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और दिव्य वस्त्र धारण करके भगवान आपकी जय हो! कहकर अपने पिता के पास गया। उसके पिता ने प्रसन्न होकर उसे समस्त राज्य का भार सौंप दिया और स्वयं वन में तपस्या करने चला गया।
अब लुम्पक शास्त्रानुसार राज्य करने लगा। उसके स्त्री, पुत्र आदि सारा कुटुम्ब भगवान नारायण का परम भक्त हो गया। वृद्ध होने पर वह भी अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन में तपस्या करने चला गया और अंत समय में वैकुंठ को प्राप्त हुआ।



Click it and Unblock the Notifications