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होली मूहूर्त 2018 : इस बार सांझ ढलने के साथ होगा होलिका दहन

होली आने में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं, होली आने से पहले ही आसपास के माहौल रंगो से सरोबार हो उठते हैं। दुकानों में गुलाल और पिचकारियां सजी हुई नजर आने लग जाती हैं। गांव और छोटे शहरों में तो होली से 10 दिन पहले ही रंगोत्सव सजने लगते है। होली में जितना महत्व रंगों को है उतना ही होलिका दहन का भी है।
होलिका दहन में होली की पूजा करके होली की शुरुआत की जाती हैं। आज हम आपको होलिका दहन का मूहूर्त और इस दौरान की जाने वाली पूजा की विधि के बारे में आपको बताने जा रहे हैं।

होलिका दहन का मूहूर्त
होली के एक दिन पहले शाम को होलिका दहन किया जाता है। इस बार होलिका दहन 1 मार्च को है जिसका मुहूर्त शाम 6 बजकर 26 मिनट से लेकर 8 बजकर 55 मिनट तक रहेगा।

प्रदोष काल में ही दहन
शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन पूर्णिमा में प्रदोष काल के दौरान अच्छा माना जाता है। भद्रा मुख को त्याग कर रात्रि में होलिका दहन करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन पूर्णिमा में प्रदोष काल के दौरान अच्छा माना जाता है। भद्रा मुख को त्याग कर रात्रि में होलिका दहन करना चाहिए।

यह है विधि
मान्यताओं के अनुसार, होलिका की पूजा करते वक्त पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठने की सलाह दी जाती है। होलिका पूजन करने के लिए गोबर से बनी होलिका और प्रहलाद की प्रतीकात्मक प्रतिमाएं, माला, रोली, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल, पांच या सात प्रकार के अनाज, नई गेहूं और अन्य फसलों की बालियां और साथ में एक लोटा जल रखना अनिवार्य माना जाता है। इसके साथ ही बड़ी-फूलौरी, मीठे पकवान, मिठाईयां, फल आदि भी पूजा के दौरान चढ़ाए जाते हैं। थोड़ा सा रंग भी होलिका को अर्पण करना चाहिए।

होलिका की भस्म को माना जाता है शुभ..
ऐसा माना जाता है कि होलिका दहन के बाद जली हुई राख को अगले दिन सुबह घर में लाना शुभ रहता है, कई जगहों पर होलिका की भस्म का शरीर पर लेप भी किया जाता है। इसे काफी शुभ माना जाता है।

बुराई की अच्छाई पर जीत..
होली के त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि होली शब्द हिरण्याकश्यप की बहन होलिका के नाम पर पड़ा है। कहते है होलिका को वरदान मिला था कि वो कभी भी आग में नहीं जल सकती हैं। होलिका ने अपने भाई की बात मानते हुए हिरण्याकश्यप के बेटे प्रह्लाद को लेकर होलिका चिता पर बैठ गई थी। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से होली जल कर भस्म हो गई और प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ। तभी से इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग आपस के मन मुटावों को भूलकर आपस में प्रेम भी भावना से आपस में मिलते हैं और अपने पुराने गिले शिकवों को भुला देते हैं।

मुगल काल में भी था होली का महत्व..
मुगलकाल के समय में भी भारत में होली मनाई जाती है। इतिहास में बादशाह अकबर का जोधाबाई के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। मुगल काल में इसे ईद-ए-गुलाबी कहा जाता था। तब लोग एक दूसरे के ऊपर रंगों की बौछार करके होली का त्योहार मनाते थे।



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