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Mahila Diwas 2026: 8 मार्च 2026 को पूरी दुनिया 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस' मना रही है, लेकिन क्या वाकई आज की आधुनिक स्त्री खुद को सुरक्षित महसूस करती है? हम चांद पर पहुंच गए, डिजिटल क्रांति ले आए, लेकिन विडंबना यह है कि आज भी भारत सहित पूरे विश्व में महिलाएं उतनी ही असुरक्षित महसूस करती हैं जितनी सदियों पहले थीं। रात में घर से बाहर निकलन में डर लगता है। अगर किसी लड़की के साथ कुछ गलत हो जाए तो कहीं न कहीं समाज की दकियानुसी सोच उसी को उसका जिम्मेदार ठहराने में भी नहीं चूकती है।
अगर किसी शादीशुदा महिला की लाइफ में कुछ उतार-चढ़ाव आते हैं तो उसकी परवरिश पर सवाल उठा दिए जाते हैं, और हद तो तब हो जाती है जब लड़की के चरित्र पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। ऊंची इमारतों और चकाचौंध भरे ऑफिसों के बीच, सुरक्षा का सवाल आज भी अधूरा है। असल सुरक्षा केवल 'जीरो एफआईआर' या कानूनी धाराओं में नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच और परवरिश में छिपी है। आइए आज महिला दिवस के मौके पर जानते हैं वे 4 अहम मोर्चे, जहां हर महिला को अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक होना और अपने अधिकारों को पहचानना बेहद जरूरी है।

1. घरेलू सुरक्षा: अपनों के बीच खुद को सुरक्षित करना
कहते हैं घर सबसे सुरक्षित जगह होती है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ सबसे ज्यादा हिंसा उनके अपनों के बीच ही होती है। बचपन से लेकर टीनएज तक, कई बार लड़कियां घर के भीतर ही शोषण का शिकार होती हैं। घर की सुरक्षा केवल चारदीवारी से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता से आती है। ऐसे में जरूरी है कि माताओं और बहनों को एक-दूसरे की ढाल बनना होगा ताकि कोई भी 'अपना' सीमा न लांघ सके।
2. सामाजिक सुरक्षा: 'परवरिश' से बदलें समाज की सोच
अक्सर समाज और उसकी रूढ़ियां महिलाओं की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बनती हैं। "लोग क्या कहेंगे" का डर हिंसा और असुरक्षा को जन्म देता है। आपने अक्सर देखा होगा कि बेटियों के साथ गलत होने पर भी कई बार माताएं उन्हें ये कहकर चुप करवा देती हैं कि तुम लड़की हो दुनिया तुम्ही पर उंगली उठाएगी।
ये तो आप भी मानेंगे कि अब बदलाव की जरूरत है और जिस दिन माताएं अपने बेटे और बेटियों की परवरिश में फर्क करना छोड़ देंगी, उसी दिन सुरक्षित समाज की नींव पड़ जाएगी। बेटियों को सहन करना नहीं, बल्कि सही के लिए लड़ना सिखाना ही असली सामाजिक सुरक्षा है।
3. सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा
सड़क, बाजार या गली-चौराहे आज भी महिलाओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। अश्लील कमेंट्स और बुरी नजरों के बीच महिलाएं अक्सर खुद को अकेला पाती हैं। ऐसे में घर से निकलने में भी महिलाएं डरने लगती हैं, इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है कहीं न कहीं इसके लिए उन्हें ही गलत ठहराना।
कभी उनके कपड़ों पर सवाल उठ जाते हैं तो कभी उनके हंसने-बोलने पर, लेकिन क्या महिलाओं को खुद के लिए खुश रहने का भी हक नहीं है। महिला की सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। जब किसी महिला के साथ सार्वजनिक स्थान पर अभद्रता हो, तो मूकदर्शक बनने के बजाय समाज को एक साथ खड़ा होना होगा। निडर होकर बाहर निकलना हर स्त्री का बुनियादी अधिकार है।
4. वस्तु नहीं, व्यक्तित्व बनें
आज के दौर में बाजारवाद ने महिलाओं को एक प्रोडक्ट की तरह पेश करना शुरू कर दिया है। विज्ञापनों से लेकर बॉलीवुड तक, स्त्री देह को अक्सर उपभोग की वस्तु बनाकर पेश किया जाता है, जिससे कुत्सित मानसिकता वाले लोगों को बढ़ावा मिलता है। महिलाओं को अपनी पहचान और गरिमा की सुरक्षा के लिए इस बाजारवादी सोच के खिलाफ खड़ा होना होगा। यह समझना जरूरी है कि स्त्री महज एक देह नहीं, बल्कि एक सशक्त इंसान और व्यक्तित्व है।
ये भी जान लें
1091 और 112: किसी भी आपात स्थिति में इन नंबर्स पर तुरंत कॉल करें।
Zero FIR: आप देश के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकती हैं, चाहे घटना कहीं भी हुई हो।
हां, श्रम कानूनों के तहत यह नियोक्ता (Employer) की जिम्मेदारी है कि वह रात में काम करने वाली महिला कर्मचारियों को सुरक्षित घर छोड़ने और कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण प्रदान करने की व्यवस्था करे।
पीड़ित महिला महिला हेल्पलाइन नंबरों के अलावा NCW (राष्ट्रीय महिला आयोग) की वेबसाइट पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकती है या पास के पुलिस स्टेशन में जाकर 'घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम' के तहत मदद ले सकती है।



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