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जानिए अक्षया तृतीया पर कनकधरा स्त्रोत का महत्व
कनकधारा स्त्रोतम इस दिन जाप किया जाने वाला सबसे सही पाठ होता है। आपको बता दें कि इसे गुरू आदि शंकराचार्य ने लिखा था और इसके पीछे एक रोचक कहानी है।
कनकधारा स्त्रोतम, मां लक्ष्मी को समर्पित होता है। ये संस्कृत के दो शब्दों, कनकम और धारा से मिलकर बना होता है जिसमें कनकम का अर्थ सोना या स्वास्थ्य और धारा का अर्थ - 'जो संभाल कर रखें' होता है। मां लक्ष्मी का सदैव घर में वास बना रहें, इसके लिए कनकधारा स्त्रोतम का जाप करना सही रहता है।
अक्षय तृतीया के दिन मां लक्ष्मी की पूजा विशेष रूप से की जाती है। इस दिन मां लक्ष्मी के साथ-साथ भगवान कुबेर, भगवान गणेश और भगवान विष्णु को भी पूजा जाता है और जीवन में खुशहाली, सफलता और समृद्धि की कामना की जाती है। अक्षय तृतीया को मां लक्ष्मी की पूजा के लिए सबसे खास दिन माना जाता है और इसके पीछे कई कहानी और किंवदंतियां हैं।
कनकधारा स्त्रोतम इस दिन जाप किया जाने वाला सबसे सही पाठ होता है। आपको बता दें कि इसे गुरू आदि शंकराचार्य ने लिखा था और इसके पीछे एक रोचक कहानी है।

ये है काहानी
ऐसा कहा जाता है कि गुरू आदि शंकराचार्य अपने जीवन यापन के लिए भिक्षा पर निकलें। वो एक झोपड़ी के पास पहुँचे और वहां एक गरीब महिला को देखा। वो महिला गुरू को देखकर खुश हो गई कि कोई उनके द्वार आया है पर वो उदास भी हो गई कि उसके पास उन्हें दान में देने के लिए कुछ भी नहीं है। उसने रसोई में सब जगह देखा, उसे कुछ नहीं मिला और बाद में उसे कुछ सूखे बेर मिले। उसे वो बेर देने में शर्म आ रही थी लेकिन वो गुरू को खाली हाथ भेजना नहीं चाह रही थी, इसलिए उसने उन्हें रूखे बेर दे दिये।

मां लक्ष्मी हो गई प्रकट
गुरू आदि शंकराचार्य ने उस महिला को स्पर्श किया और उसके बाद उसकी दरिद्रता दूर हो गई क्योंकि दान मिलने के दौरान उनके मुख से देवी महा लक्ष्मी के लिए गीत निकला। इन गीत के समापन होते ही माता लक्ष्मी अवतरित हुई और उन्होंने एक वरदान मांगने को कहा। इस वरदान में गुरू शंकराचार्य ने उस महिला की दरिद्रता को दूर करने का वरदान मांग लिया। तब से लेकर आज तक ऐसा माना जाता है जो भी व्यक्ति इस स्त्रोतम का जाप करता है मां लक्ष्मी उस पर अपनी कृपा बनाएं रखती हैं।

ये है स्त्रोत
ऐसा माना जाता है कि कनकधारा स्त्रोतम बहुत ही शक्तिशाली जाप है जिसे सच्चे मन से करने पर आपको माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। आप इन स्त्रोतम को इस प्रकार पढ़कर जाप कर सकते हैं।

इसके सभी हिस्सों को नीचे लिखा गया है:
1. अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।
2. अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।
3. आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।
4. बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।
5. कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।
6. प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।
7. विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।
8. इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।
9. दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।
10. गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै।
11. श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।
12. नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।
13. नमोस्तु हेमम्भूजा पीठीकायाई, नमस्तु् भो मंडला नायीकायाई,
नमोस्तु देवाथी धाया परायी, नमोस्तु सारंगायुद्ध वल्लाुभाई।
14. नमोस्तु देवाई भृगु नंदनयाई, नमोस्तु विश्नोनरूरासी स्ती थाई,
नमोस्तु लक्ष्माोई कमलालाई, नमोस्तु धर्मोधरा वल्ल भभाई।
15. नमोस्तु कांथाई कमलेक्शायनायी, नमोस्तु भूथायी भूवपानाप्रासूथाई
16. नमोस्तु देवाधिभीर आरचिथायी, नमोस्तु नंदधाथामज़ा वल्लाभाई।
17. सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।
18. यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।
19. सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।
20. दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।
21. कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।



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