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Sheetla Ashtami: शीतला अष्टमी की पूजा होती है विशेष, जानें क्यों मां को चढ़ाया जाता है बासी भोजन
हर साल होली पर्व के बाद चैत्र माह की कृष्ण अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी का त्योहार मनाया जाता है जिसे बसौड़ा भी कहा जाता है। इस त्योहार की तैयारियां एक दिन पहले सप्तमी तिथि से ही शुरू हो जाती हैं। अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता है इसलिए एक दिन पहले ही तरह तरह के पकवान तैयार करके रख लिए जाते हैं और अष्टमी पूजा वाले दिन बासी भोजन का भोग मां को लगाया जाता है। बसौड़ा का ये पर्व उत्तर भारत, खासतौर से राजस्थान में धूमधाम से मनाया जाता है। जानते हैं इस वर्ष शीतला अष्टमी की तिथि, पूजा विधि, महत्व और विशेष मंत्र के बारे में।

शीतला अष्टमी तिथि और पूजा मुहूर्त 2020
शीतला अष्टमी को बसौड़ा के अलावा लसौड़ा या बसियौरा के नाम से भी जाना जाता है।
4 अप्रैल 2021, रविवार
चैत्र मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि
अष्टमी तिथि आरंभ- 4 अप्रैल 2021 को सुबह 04 बजकर 12 मिनट से
अष्टमी तिथि समाप्त- 05 अप्रैल 2021 को प्रातः 02 बजकर 59 मिनट तक
पूजा मुहूर्त- सुबह 06 बजकर 08 मिनट से लेकर शाम को 06 बजकर 41 मिनट तक
पूजा की कुल अवधि- 12 घंटे 33 मिनट

शीतला अष्टमी व्रत का महत्व
शीतला अष्टमी की पूजा बिल्कुल ही अलग ढंग से की जाती है। शीतला अष्टमी से एक दिन पहले सप्तमी तिथि को कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं। एक दिन बासी हो जाने के बाद अष्टमी तिथि को ये पकवान शीतला मां को चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि शीतला अष्टमी के दिन घर में भोजन नहीं बनाया जाता है बल्कि माता को बासी भोजन का भोग लगाने के बाद वही प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। बासी भोजन से जुड़ी इस परंपरा के पीछे एक खास तर्क है। दरअसल इस समय से ही बसंत की विदाई होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। इस रिवायत के साथ ही ये संदेश दिया जाता है कि अब से लोग बासी भोजन खाने से बचें और अपनी सेहत का ख्याल रखें।

शीतला मां की आराधना के लिए करें इस मंत्र का जप
''ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः''
वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

कौन है शीतला माता?
आपको स्कंद पुराण में शीतला माता के बारे में विस्तार से जानकारी मिलेगी। स्कंद पुराण के मुताबिक शीतला माता चेचक जैसे रोग की देवी हैं, इनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू तथा नीम के पत्ते धारण किए होती हैं। माता गर्दभ की सवारी किये हुए अभय मुद्रा में विराजमान हैं। शीतला माता के साथ ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण त्वचा रोग के देवता तथा रक्तवती देवी विराजमान होती हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणुनाशक जल होता है।



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