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भूलकर भी सोते वक्त इस दिशा में न रखें पैर, आ जाती है नेगेटिविटी
वास्तु के अनुसार, हिंदू धर्म में पूर्व दिशा को सबसे शुभ और दिव्य दिशा माना गया है। लोगों का मानना है कि इस दिशा से ईश्वरीय शक्तियां प्रकट होती हैं, जिससे आध्यात्मिक प्रवृत्ति जगती है। ब्रह्मांड में तीन तरह की शक्तियां होती हैं, जिन्हें सात्विक, राजसिक और तामसिक कहा जाता है। सात्विक ऊर्जा पर्यावरण में ईश्वरीयता को फैलाती है। यह दयालुता, प्रेम, सद्भाव, क्षमा और करुणा जैसे गुणों से संबंधित है। बाकी दो शक्तियां भौतिकवादी दुनिया के गुणों से भरपूर है। राजसिक प्रवृत्ति वाले लोगों में महत्वाकांक्षा, बेचैनी, इच्छाएं आदि होती हैं। वहीं तामसिक ऊर्जा नींद, आलस्य, लत, लालच और वासना जैसे गुणों को जगाती है। इन तीनों में से सबसे अच्छा गुण सात्विक है। यह गुण इंसान को आत्मशक्ति के लिये प्रेरित करता है, जो भविष्य में इंसान को ज्ञान और मोक्ष की ओर ले जाता है।
ये सभी गुण प्रत्येक मानव में मौजूद होते हैं, लेकिन अलग-अलग अनुपात में। साथ ही इन गुणों का अनुपात मनुष्य की दैनिक दिनचर्या के अलग-अलग पहर में बदलता रहता है। सुबह के समय हम लोग सात्विक गुणों से जुड़े रहते हैं, लेकिन रात के वक्त तामसिक से जुड़ जाते हैं। चूंकि पूर्व दिशा दिव्यता से जुड़ी हुई है और सबसे पवित्र दिशा मानी जाती है, साथ ही यह दिशा सात्विक गुण से जुड़ी होती है। अब आप सोच रहे होंगे कि इस दिशा का सोने से क्या लेना-देना है। इसका जवाब हम आपको देते हैं।

दरअसल, मानव शरीर में तीन उप-भाग होते हैं। ये भौतिक, मानसिक और सूक्ष्म शरीर के रूप में होते हैं। सूक्ष्म शरीर को आत्मा के रूप में भी जाना जाता है। यह आत्मा भौतिक शरीर से एक चांदी की तार से जुड़ी होती है। जो भौतिक शरीर में ज़िम्मेदारी की चेतना को जगाती है। सूक्ष्म शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है मस्तिष्क, जिससे मानव शरीर में जागरूकता, ज्ञान और सकारात्मकता प्रवेश करती है। यह आध्यात्मिक जागृति और ज्ञान मनुष्य को जागरुक बनाती है।
आयुर्वेद बताता है कि मानव शरीर में सात चक्र होते हैं। ये चक्र घूमते हैं और शरीर में ऊर्जा का विनियमन करते हैं। जब चक्र सही दिशा में घूमते हैं तो मानव शरीर में सात्विक ऊर्जा पैदा करते हैं, यानि सकारात्मक गुण।
जिस प्रकार सुबह का समय सत्विक ऊर्जा से जुड़ा होता है, वैसे ही रात का वक्त तामसिक ऊर्जा से जुड़ा होता है। इसलिये रात के समय मनुष्य में तामसिक गुण अधिक पाये जाते हैं। वह रात्रि में नकारात्मक और तामसिक प्रवृत्तियों को ही फैलाता है। इस तरह के गुणों को पश्चिम दिशा की ओर ही फैलाना चाहिए। ताकि वे पूर्व दिशा से आने वाली पॉजिटिव एनर्जी को ले सकें। माना जाता है कि पश्चिम दिशा तामसिक गुणों से जुड़ी होती है। यहां यह समझना ज़रूरी है कि सभी ऊर्जाएं शरीर में सिर से होकर ही जाती हैं और पैरों के ज़रिए बाहर निकलती हैं।
जब आप पूर्व की ओर सिर रखते हैं और पश्चिम की ओर पैर रखते हैं, तो जितनी भी नकारात्मक शक्तियां होती हैं वे पैरों के माध्यम से पश्चिम दिशा की ओर बाहर निकल जाती हैं। और पूर्व से आने वाली सकारात्मक एनर्जी सिर में प्रवेश कर जाती है।
हालांकि यह दूसरा तरीका है जिसमें आपका सिर पश्चिम की तरफ और पैर पूर्व की तरफ होते हैं, ऐसे में नेगेटिव एनर्जी जो पहले से ही शरीर में मौजूद है वो पैरों के ज़रिए पश्चिम की तरफ बढ़ती है। यह तामसिक ऊर्जा पूर्व से आने वाली सात्विक ऊर्जा से संघर्ष करती है। आपका सिर अगर पश्चिम दिशा में है तो आपमें सकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं कर पाएंगी और नेगेटिव वाइब्स लगातार पश्चिम से आती रहेंगी। इससे आप में नेगेटिव वाइब्स ही भर जाती हैं।
आपको बता दें कि ऊर्जा के इस नियम में हमेशा बहुमत ही जीतता है। इसका मतलब है कि जो भी शरीर में अधिक है उसी का ही प्रभुत्व होगा। अगर आपमें नकारात्मक और तामसिक ऊर्जा की मात्रा अधिक होगी, तो आप नेगेटिव ही सोचेंगे और आपसे नेगेटिव वाइब्स ही आएंगी। इसलिए जो व्यक्ति इस दिशा में रोज़ाना सोते हैं उनमें नकारात्मकता बहुत अधिक होती है। इसलिये वास्तु के अनुसार हम सबको पूर्वोत्तर दिशा में सोने की सलाह दी जाती है।



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