Latest Updates
-
Mahesh Navami 2026: महेश नवमी आज, जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि -
Bada Mangal 2026: ज्येष्ठ माह का आखिरी बड़ा मंगल आज, इन उपायों को करने से मिलेगी हनुमान जी की विशेष कृपा -
Happy Mahesh Navami 2026 Wishes: महेश जिनका नाम है...महेश नवमी पर प्रियजनों को भेजें ये खास शुभकामना संदेश -
Aaj Ka Rashifal 23 June 2026: मंगलवार को इन 4 राशियों पर बरसेगी बजरंगबली की कृपा, जानें अपना भाग्य -
शाम 7 बजे के बाद गलती से भी मत करना ये 5 काम, बढ़ता है हार्ट अटैक का रिस्क -
बिना मारे चूहों को घर से भगाने का देसी तरीका! आटे में मिलाकर रख दें ये एक चीज, फिर कभी नहीं आएंगे नजर -
Pahadi Crispy Snack Singal Recipe: घर पर बनाएं उत्तराखंड का पारंपरिक और कुरकुरा स्वाद -
कौन हैं पंकज त्रिपाठी के भाई बिजेंद्र नाथ तिवारी? आखिर क्यों हुआ जानलेवा हमला, गंभीर हालत में AIIMS में भर्ती -
Swapna Shastra: सपने में किन्नर को देखना होता है शुभ और अशुभ संकेत? जानिए इसका मतलब -
Cooling Summer Lunch Curd Rice Recipe: गर्मियों में पेट को ठंडक देने वाली सबसे आसान रेसिपी
Valmiki Jayanti 2021: जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और इस दिन का धार्मिक महत्व
इस साल वाल्मीकि जयंती का पर्व 20 अक्टूबर के दिन मनाया जा रहा है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार वाल्मीकि जयंती हर साल आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। शास्त्रों की मानें तो महर्षि वाल्मीकि का जन्म महर्षि कश्यप और अदिति के नौवें पुत्र वरुण और उनकी पत्नी चर्षिणी के यहां हुआ था। इनके ज्येष्ठ भाई का नाम भृगु ऋषि था। महर्षि वाल्मीकि ने ही रामायण जैसे महाकाव्य की रचना की। इस लेख के माध्यम से जानते हैं वाल्मीकि जयंती का शुभ महूर्त, मनाने की विधि और इस पर्व का महत्व।

वाल्मीकि जयंती की तिथि व शुभ मुहूर्त
पूर्णिमा तिथि के लिए पूजा का समय
19 अक्टूबर को शाम 07:03 बजे शुरू
20 अक्टूबर को रात 08:26 बजे समाप्त

वाल्मीकि जयंती कैसे मनाई जाती है?
वाल्मीकि जयंती के शुभ दिन पर देश के विभिन्न मंदिरों में उनका पूजन तथा आरती की जाती है। इस दिन शोभा यात्रा निकालने की भी परंपरा है। कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण वाल्मीकि जयंती की धूम कम रहने की ही संभावना है। वाल्मीकि जयंती के दिन उनके द्वारा रचित रामायण का पाठ करना शुभ होता है।

वाल्मीकि नाम कैसे पड़ा?
प्रचलित कथा के अनुसार कहा जाता है कि एक बार महर्षि वाल्मीकि ध्यान में डूबे हुए थे। तब उनके शरीर में दीमक चढ़ गई। साधना के पूर्ण होने के पश्चात् महर्षि वाल्मीकि ने दीमकों को हटाया था। दीमकों के घर को वाल्मीकि कहा जाता है। ऐसे में इन्हें भी वाल्मीकि पुकारा जाने लगा। वाल्मीकि को रत्नाकर के नाम से भी जानते हैं।

वाल्मीकि आश्रम में ठहरीं थीं माता सीता
भगवान राम ने जब माता सीता को त्याग दिया था तब वह महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ही रहती थी। लव और कुश का जन्म भी इस आश्रम में ही हुआ था। माता सीता की पुत्रों के लालन पालन के अलावा महर्षि वाल्मीकि ने उन दोनों को ज्ञान भी दिया। इस आश्रम में माता सीता वनदेवी के नाम से निवास करती थी।



Click it and Unblock the Notifications