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Skanda Sashti 2023: संतान सुख के लिए ऐसे करें स्कंद षष्ठी पर व्रत और पूजा
स्कंद षष्ठी के दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र श्री कार्तिकेय की पूजा की जाती है। कहते हैं इस दिन कार्तिकेय जी की पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है।
स्कंद षष्ठी को संतान षष्ठी या कांड षष्ठी भी कहा जाता है। माना जाता है कि इस दिन ही भगवान स्कंद का जन्म हुआ था जिन्हें कार्तिकेय, मुरुगन, सुब्रहमन्यम आदि नाम से भी जाना जाता है।

संतान के इच्छुक लोग इस दिन व्रत और पूजा करते हैं। इसके अलावा लोग अपने बच्चों के खुशहाल और स्वस्थ जीवन के लिए भी भगवान स्कंद की आराधाना करते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह के शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को स्कंद षष्ठी पड़ती है। वैशाख माह में स्कंद षष्ठी की पूजा और व्रत 25 अप्रैल, मंगलवार को है। भारत के कई स्थानों पर इस दिन विधि विधान से पूजा की जाती है, लेकिन दक्षिण भारत में इस पूजा का विशेष महत्व होता है। स्कंद षष्ठी के शुभ अवसर पर यहां लोग पूरे 6 दिनों तक व्रत रखते हैं। आइए जानते हैं इस पूजा की विधि, तिथि और महत्व के बारे में।
स्कंद षष्ठी की तिथि
25 अप्रैल मंगलवार को सुबह 09 बजकर 39 मिनट पर षष्ठी तिथि की शुरूआत हो जाएगी जो 26 अप्रैल को सुबह 11 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगी।
स्कंद षष्ठी पूजा विधि
स्कंद षष्ठी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद आप व्रत का संकल्प लें। पूजा के स्थान पर आप भगवान कार्तिकेय के साथ महादेव और देवी पार्वती की चित्र या मूर्ति को भी स्थापित करें। फिर भगवान के आगे घी का दीपक जलाएं। उन्हें चंदन, अक्षत, पुष्प कलावा आदि चढ़ाएं। आप भोग में भगवान को फल चढ़ा सकते हैं। इसके बाद स्कंद षष्ठी की कथा पढ़ें या सुनें। अंत में आरती करें और फिर सभी को प्रसाद बांटे। शाम को इस विधि से एक बार फिर पूजा करें।
स्कंद षष्ठी की कथा
माना जाता है कि षष्ठी के दिन ही भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ था इसलिए इसे स्कंद षष्ठी कहा जाता है। भगवान के जन्म के पीछे जुड़ी कथा कुछ इस प्रकार हैं, जब देवी सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर खुद को भस्म कर लिया था। तब भगवान शिव विलाप करते हुए तपस्या में लीन हो गए थे। इस बात का फायदा उठाते हुए दैत्य तारकासुर ने चारों ओर आतंक मचा रखा था। सभी देवी देवता तारकासुर के अत्याचारों से काफी परेशान थे। तब ब्रह्मा जी ने कहा था कि तारकासुर का वध शिव जी के पुत्र के हाथों ही होगा। इसके बाद सभी देवी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे। महादेव ने माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उनसे विवाह कर लिया था जिसके बाद भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ। तारकासुर का वध करके कार्तिकेय जी ने सभी देवी देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया था।
स्कंद षष्ठी का महत्व
कहते हैं स्कंद षष्ठी के दिन व्रत और पूजा करने से संतान पर आए सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। भगवान कार्तिकेय उन्हें हमेशा दुख और दरिद्रता से दूर रखते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से ऋषि च्यवन को अपनी आंखों की रोशनी मिली थी। इसके अलावा भगवान ने प्रियव्रत के मृत शिशु को फिर से जीवित कर दिया था।
भगवान स्कंद का दक्षिण भारत से है गहरा संबंध
दक्षिण भारत में स्कंद षष्ठी का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां भगवान कार्तिकेय के कई सारे मंदिर भी हैं। कहते हैं एक बार जब भगवान कार्तिकेय किसी बात पर नाराज हो गए थे तो वह भगवान शिव और माता पार्वती को छोड़कर दक्षिण के मल्लिकार्जुन चले गए थे। यही वजह है कि दक्षिण को भगवान स्कंद का निवास स्थान माना जाता है।



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