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Teachers Day 2025 Sanskrit Dohe: शिक्षक दिवस पर इन श्लोक और दोहे के जरिए दें गुरुजन को सम्मान
Teacher's Day 2025 Famous Sanskrit Dohe : सनातन धर्म में गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। शास्त्रों में कहा गया है - गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः। इसका तात्पर्य है कि गुरु साक्षात ब्रह्म स्वरूप होते हैं, जो सृष्टि का ज्ञान कराते हैं और हमें धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
संत कबीर दास जी ने भी गुरु की महिमा को समझाते हुए कहा है - गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरू अपने, गोविन्द दियो बताय।। अर्थात गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं। शिक्षक दिवस जैसे अवसर पर हम उन गुरुओं का वंदन करते हैं, जो हमारे जीवन में अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु ही हमें सच्चाई, कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। इस दिन उनका आभार व्यक्त करना हर शिष्य का कर्तव्य है। "शिक्षक दिवस" पर संस्कृत के श्लोक और दोहे के माध्यम से हम अपने शिक्षकों के प्रति आभार और समर्पण व्यक्त कर सकते हैं।

शिक्षक दिवस संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shalok For Teachers Day 2025)
1. गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
अर्थ- इस श्लोक में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के समान बताया गया है और उन्हें परम ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। इसके साथ ही ये श्लोक गुरु के प्रति आदर और श्रद्धाभाव को भी व्यक्त करता है।
2. विद्वत्त्वं दक्षता शीलं सङ्कान्तिरनुशीलनम् ।
शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता ॥
अर्थ- इस श्लोक में शिक्षक के सबसे महत्वपूर्ण गुण, जैसे विद्वत्ता, दक्षता, शील, स्नेहभाव और उनकी अनुशासन क्षमता की प्रशंसा की जाती है।
3. दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् ।
गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन ॥
अर्थ- इस श्लोक में शिष्य और गुरु के संबंध को दुग्ध और धेनु, कुसुम और वल्ली, शील और भार्या, कमल और तोय के समान दर्शाया गया है।
4. सर्वाभिलाषिणः सर्वभोजिनः सपरिग्रहाः ।
ब्रह्मचारिणो मिथ्योपदेशा गुरवो न तु ॥
अर्थ : यह श्लोक गुरु की महानता दर्शाता है। गुरु निस्वार्थ, सर्वभोजी, संयमी और सत्योपदेशक होते हैं। वे शिष्य को सच्चे मार्ग पर चलने की शिक्षा देते हैं और अपने आदर्शों से जीवन को प्रकाशमय बनाते हैं।
शिक्षक दिवस पर संस्कृत दोहे ( Teachers Day ke Sanskrit Dohe)
1. गुरु गोविन्द दोऊ खड़े , काके लागू पाया
बलिहारी गुरु आपने , गोविन्द दियो बताया
अर्थ- इस दोहे का अर्थ है कि जब गुरु और भगवान एक साथ होते हैं, तो प्राथमिकता गुरु को ही देनी चाहिए। इसका कारण यह है कि गुरु ही हमें भगवान के प्रति श्रद्धा का मार्ग दिखाते हैं।
2. गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब सन्त।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लये महन्त ||
अर्थ- इस दोहे में संत कबीर दास जी कहते हैं कि गुरु सभी संतों को आंतरिक रूप से जानते हैं और वह शिष्य की मानसिक स्थिति को समझकर उसे धार्मिक मार्ग पर दिशा देते हैं।
3. गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि - गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥
अर्थ- इस दोहे में, संत कबीर दास जी कहते हैं कि गुरु कुम्हार के समान हैं, जो मूट्ठी में मिट्टी को बनाकर कुंभ बनाते हैं।
4. गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान॥
अर्थ: कबीर दास जी बताते हैं कि गुरु केवल इच्छाएँ पूरी करने वाले नहीं, बल्कि शिष्य को धर्म, ज्ञान और सत्य का मार्ग दिखाने वाले हैं। वे तीनों लोकों की अमूल्य संपदा प्रदान करने वाले सच्चे मार्गदर्शक हैं।
5. गुरू बिन ज्ञान न उपजई, गुरू बिन मलई न मोश।
गुरू बिन लाखाई ना सत्य को, गुरू बिन मिटे ना दोष।।
अर्थ: कबीर दास बताते हैं कि गुरु के बिना ज्ञान, आत्मशुद्धि, सत्य और दोषों से मुक्ति संभव नहीं। गुरु का मार्गदर्शन ही आध्यात्मिक और मानव जीवन को सही दिशा देता है, इसलिए उनका महत्व सर्वोपरि है।



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