Latest Updates
-
Gandhi Jayanti 2026: गांधी जी को 'बापू' क्यों कहा जाता है? जानें किसने दी थी 'महात्मा' की उपाधि -
Gandhi Jayanti Wishes 2026: हाथ में लाठी थी...गांधी जयंती पर अपनों को ये खास मैसेज भेजकर दें शुभकामनाएं -
Gandhi Jayanti 2026 Essay, Speech: गांधी जयंती पर ऐसे करें भाषण और निबंध की तैयारी, मिलेगा इनाम -
Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष में खीर बनाते समय न करें ये गलती, नहीं तो नाराज हो सकते हैं पितर, जानें सही विधि -
Koffee With Karan 9: करण जौहर का ‘कॉफी विद करण’ 22 साल बाद होगा खत्म, जानें कब और कहां स्ट्रीम होगा आखिरी सीजन -
Jitiya Vrat 2026: कब है जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत? जानें सही तारीख, और नहाय-खाय से लेकर पारण तक का समय -
लाखों में बिकती है दुनिया की सबसे महंगी कॉफी, लेकिन बनाने का प्रोसेस जानकर फ्री में भी पीने से करेंगे तौबा! -
पाम ऑयल क्या होता है और इसे खाने से क्या नुकसान होते हैं? जानिए इससे शरीर पर क्या असर होता है -
October 2026 Vrat Tyohar List: नवरात्रि, दशहरा से करवा चौथ तक, यहां देखें व्रत-त्योहारों की पूरी लिस्ट -
जुबिन नौटियाल बने पापा, पत्नी ने दिया बेटे को जन्म, गणेश चतुर्थी पर घर आया नन्हा मेहमान
Gandhi Jayanti: चंपारण के गांधी से महात्मा गांधी का सफ़र! जानिये वो दिलचस्प घटनाक्रम जो कम लोगों को है पता
Gandhi Jayanti Special: गांधी को पहले चंपारण जाने की इच्छा नहीं थी किन्तु कुछ लोगों के निरंतर आग्रह पर वे चंपारण गए और वहां जो कुछ भी हुआ वो किसी मिसाइल के लॉन्चिंग पैड से कम नहीं रहा। मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी बनने के सफ़र में चंपारण की धरती एक प्रयोगस्थल के रूप में हमेशा याद की जायेगी।
आज महात्मा गांधी एक वैश्विक महापुरुष के रूप में जाने जाते हैं। अपने सत्याग्रह के हथियार से इन्होंने अहिंसात्मक रूप से इन्होंने उस फ़ौज के साथ लड़ाई लड़ी जो उस समय के आधुनिक हथियारों से लैस थे किन्तु विजय गांधी की ही हुई और यहीं से उनकी लोकप्रियता ने देश की सीमा को लांघ कर वैश्विक लोकप्रियता के क्षितिज को छू लिया।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि महात्मा गांधी के सत्याग्रह रूपी यज्ञ में पहला हवन जिस स्थल पर पड़ा वो बिहार का चंपारण था। यज्ञ सफल भी हुआ और इसी आधार पर ये प्रयोग पूरे राष्ट्र के लिए किया जाने लगा। गांधी को चंपारण ने आत्मविश्वास दिया और एक आशा दी कि गांधी अपने अहिंसा और सविनय अवज्ञा के हथियार से देश को स्वराज दिला सकते हैं।
बिहार के उत्तर पश्चिम क्षेत्र में एक जिला था चंपारण जिसे बाद में दो हिस्सों में बाँट दिया गया। एक पूर्वी चंपारण जिसका मुख्यालय मोतिहारी में है और दूसरा पश्चिम चंपारण जिसका मुख्यालय बेतिया में है। पहले यहां गन्ने की खेती मुख्य रूप से होती थी किन्तु अंग्रेजों ने कालांतर में यहां की मुख्य खेती नील कर दी। धीरे धीरे चंपारण की उर्वर भूमि नील उत्पादन के नए रिकॉर्ड तोड़ती गयी किन्तु अपनी उर्वरता खोती गयी।

यूरोपियन देशों ने कृत्रिम नील बनाना शुरू कर दिया जिससे अंग्रेजों को नुकसान होने लगा। अपने घाटे की भरपाई के लिए इन्होंने नील किसानों पर तरह तरह के कर लगाने शुरू कर दिए। यदि किसान हर्जाना नहीं दे पाता था तो उन्हें 12 प्रतिशत के दर से चक्रव्रिधि ब्याज देना होता था जो असहनीय होता जा रहा था। ब्याज नहीं देने पर जमीन बंधक के तौर पर रख लिया जाता था। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि इन नील किसानों की दयनीय स्थिति से महात्मा गांधी वाकिफ नहीं थे। उन्होंने खुद कहा है "मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि मैं चंपारण का नाम भी नहीं जानता था, इसकी भौगोलिक स्थिति से भी अवगत नहीं था, और मुझे शायद ही नील की खेती से संबंधी कोई जानकारी थी।"
अब हुआ यूं कि उस समय गांधी जी अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ सफल प्रयोग कर के भारत लौटे थे। उन्हें एक मसीहा के तौर पर देखा जाने लगा था। बिहार के एक किसान राज कुमार शुक्ल गांधी जी के पीछे पड़ गए कि आप बिहार चलिए और चंपारण के नील किसानों पर हो रहे अत्याचार पर भी कुछ करिए।
महात्मा गांधी ने पहले मना कर दिया। लेकिन शुक्ल और इनके साथ एक और व्यक्ति ब्रजकिशोर प्रसाद ने गांधी जी का पीछा नहीं छोड़ा। अंततः 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के दौरान गांधी जी चंपारण जाने को तैयार हो गए। गांधी के चंपारण पहुंचने के साथ ही इनके महात्मा बनने की यात्रा प्रारंभ हो गयी। गांधी ने जसोली गाँव की यात्रा की। यहाँ एक सब-इंस्पेक्टर ने उनकी आगे की यात्रा रोक दी और मजिस्ट्रेट से मिलने का अनुरोध किया। गांधी जी लौट तो गए किन्तु चंपारण छोड़ने से इंकार कर दिया और यहीं से उनके सविनय अवज्ञा की शुरुआत हुई। फिर शुरू हुई यहां से इनकी लड़ाई।
गांधी किसानों से मिलते रहे और उनकी समस्या को रिकॉर्ड करते रहे। सरकार ने इन्हें गिरफ्तार कर जज के सामने पेश किया। गांधी जी ने स्पष्ट कह दिया कि वो किसानों की समस्या सुन रहे हैं और आन्दोलन करने का इरादा बिल्कुल भी नहीं है। जज ने गांधी के साथ सहानुभूति दिखाते हुए उनकी यात्रा को जारी रखने की अनुमति दे दी। अंततः गांधी ने अपनी रिपोर्ट पेश की और सरकार को रिपोर्ट स्वीकार करना पड़ गया और कुख्यात तिनकठिया प्रणाली को समाप्त करना पड़ा।
अब नील की खेती करने के लिए किसी किसान पर दबाव नहीं डाला जा सकता था। 1917 में डब्लू मोड ने विधानपरिषद में चंपारण कृषि बिल पेश करके कानून बना दिया। महात्मा गांधी का प्रयोग सफल रहा। गाँधी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं "तिनकठिया प्रणाली, जो लगभग एक सदी से अस्तित्व में थी, इस तरह समाप्त कर दी गई और इसके साथ ही प्लांटरों का राज भी समाप्त हो गया।''
इसके बाद यह नायक पूरे देश के लिए अपने प्रायोगिक अस्त्र को आजमाने के लिए निकल पड़ा। चंपारण के गांधी से देश के महात्मा गांधी तक का सफ़र शुरू हो गया।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



Click it and Unblock the Notifications
