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सिर्फ दिवाली पर एक हफ्ते के लिए खुलते हैं इस मंदिर के पट, कपाट खुलने तक जलता रहता है दीया
भारत में ऐसे कई मंदिर है, जो अपनी अलौकिक शक्तियों की वजह से चर्चा में बने रहते हैं। इन्हीं में से एक हैं कर्नाटक के हासन जिले में स्थित हसनंबा मंदिर केवल एक बार दिवाली के समय खुलता है। मंदिर के कपाट बंद होने पर यहां एक दीपक जलाया जाता है। ताजे फूल चढ़ाने के साथ प्रसाद भी चढ़ाया जाता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि अगले साल कपाट खुलने तक न केवल दीपक जलता मिलता है बल्कि फूल और प्रसाद भी ताजा बने रहते हैं। तो आइए जानते हैं दक्षिण भारत में मशहूर इस मंदिर के बारे में।
देवी शक्ति या अम्बा को समर्पित, हसनंबा मंदिर 12 वीं शताब्दी ईस्वी में बनाया गया था। उन्हें हसन की पीठासीन देवता के रूप में माना जाता है और शहर का नाम हसन देवी हसनंबा से लिया गया है। पहले हसन को सिहमासनपुरी के नाम से जाना जाता था।

मंदिर का इतिहास
पौराणिक कथाओं के अनुसार, बहुत पहले एक राक्षस, अंधकासुर था, जिसे कठोर तपस्या के बाद, ब्रह्मा से अदृश्य होने का वरदान प्राप्त हुआ। ऐसा वरदान पाकर उसने चारों ओर अत्याचार मचा दिया। ऐसे में भगवान शिव ने उसका अंत करने का बीड़ा उठाया। उसमें इतनी शक्ति थी कि जब शिव उन्हें मारने की कोशिश करते हैं, तो जमीन पर गिरती उसके खून की एक एक बूंद राक्षस बन जाती। तब भगवान शिव ने अपनी शक्तियों से योगेश्वरी देवी का निर्माण किया, जिन्होंने अंधकासुर का नाश कर दिया।
केवल 7 दिन ही खुलता है मंदिर
मंदिर भक्तों के लिए दिवाली के दौरान केवल 7 दिनों के लिए खुलता है और बालीपद्यमी के उत्सव के तीन दिन बाद बंद हो जाता है। दिवाली के दौरान बड़ी संख्या में भक्त यहां आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं। मंदिर बंद होने पर यहां घी का दीपक जलाया जाता है और गर्भगृह में फूलों और पके हुए चावल के प्रसाद के साथ रखा जाता है।
दीया जलता रहता है वर्षपर्यंत
स्थानीय लोगों के अनुसार, एक साल बाद जब दीपावली के दिन मंदिर के पट खोले जाते हैं, तो दीपक जलता हुआ मिलता है। यहां तक की भक्तों द्वारा देवी हसनंबा पर चढ़ाए गए फूल भी ताजा होते हैं। इतना ही नहीं, यहां जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, वो भी अगले साल तक ताजा बना रहता है।
ये किवदंती है प्रचलित
पौराणिक कथाओं के अनुसार 7 देवियाँ, जिन्हें सप्तमातृका कहा गया। ये सप्तमातृकाएँ थीं, ब्राह्मी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुण्डी। ये सातों देवियाँ दक्षिणी भाग से काशी की ओर आ रही थीं लेकिन मार्ग में उन्हें एक स्थान इतना सुंदर लगा कि उन्होंने वहीं निवास करने का निर्णय लिया। यही स्थान हासन है। इन सातों देवियों में से वैष्णवी, महेश्वरी और कौमारी ने चींटियों की बाम्बी में रहना पसंद किया। चामुंडी, वाराही और इंद्राणी पास ही स्थित कुंड में रहने लगीं और ब्राह्मी केंच्चम्मना होसकोटे में। हसनंबा और सिद्धेश्वर को समर्पित इस मंदिर के परिसर में तीन मुख्य मंदिर हैं। हसनंबा में मुख्य मीनार का निर्माण द्रविड़ शैली में किया गया है। यहां का एक अन्य प्रमुख आकर्षण कलप्पा को समर्पित मंदिर भी है।
कलियुग से जुड़े चमत्कार
कहा जाता है कि देवी हसनंबा ने अपनी भक्त एक बहू को प्रताड़ित करने वाली सास को पत्थर में बदल दिया था। इसके अलावा हसनंबा के गहने चुराने की कोशिश करने के बाद देवी ने एक बार चार लुटेरों को पत्थरों में बदल दिया। ये चार पत्थर अभी भी कलप्पा गुड़ी में पाए जा सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि पत्थर हर साल एक इंच हिलता है। माना जाता है कि जब यह पत्थर हसनंबा के चरण कमलों तक पहुंच जाएगा, तो कलियुग समाप्त हो जाएगा।
कैसे पहुंचे
हासन पहुंचने के लिए नजदीकी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बेंगलुरु है जो यहाँ से लगभग 207 किलोमीटर (किमी) दूर है। इसके अलावा मैसूर हवाईअड्डा मंदिर से लगभग 127 किमी की दूरी है। इसके अलावा सड़क मार्ग से हासन कर्नाटक के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है।



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