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बचपन में हुआ पोलियो लेकिन नहीं मानी हार, 37 की उम्र में अपने पहले पैरालंपिक में जीता ब्रॉन्ज
Mona Agarwal Paralympic bronze medalist Sucess Story: हाल ही में पेरिस में हुए पैरालंपिक में जयपुर की मोना अग्रवाल ने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर न सिर्फ देश का मान बढ़ाया था बल्कि ऐसे हजारों लोगों के मन में उम्मीद का दिया जगा दिया जो विकलांगता के वजह से बेबसी का जीवन जी रहे हैं। उन्होंने सच में साबित कर दिया कि हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती हैं।
हालांकि यहां तक पहुंचने का मोना का सफर भी आसान नहीं था। बचपन में पोलियो हो गया जिसकी वजह से परेशानी होने लगी। व्हीलचेयर तक सीमित रहने वाली मोना ने जब पैरा एथेलेटिक्स की तरफ रूख किया और यहां से उन्होंने अपनी मेहनत के जरिए किस्मत के सितारे ही बदल दिए। हाल ही में पेरिस से भारत लौटी मोना अग्रवाल से जब हमने बात की तो उन्होंने अपनी कामयाबी के पीछे छिपी संघर्ष की दास्तां सुनाई।

दो बच्चों के साथ-साथ परिवार की देखरेख, नौकरी की जिम्मेदारी संभालते हुए 37 साल की उम्र में मोना ने जो कर दिखाया हे, वह हम सबके लिए प्रेरणा से कम नहीं है।। आइए आज आपको ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली मोना अग्रवाल की संघर्ष से सफलता की कहानी बताते हैं जो हम सभी के लिए प्रेरणादायक है।
बचपन में हो गया पोलियो लेकिन दादी की प्रेरणा काम आई
मोना का जन्म राजस्थान के सीकर में हुआ है। जब 9 माह की तब ही उनको पोलियो हो गया और वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गईं। इसके बाद समाज ने भी उनकी विकलांगता को लेकर खूब ताने दिए। बचपन में दादी ने मोना को खूब प्रेरित किया। उन्हीं की प्रेरणा से मैंने पैरा एथलीट बनने का सपना देखा। मोना ने करीब दो साल पहले शूटिंग सीखी इसी दौरान उन्हें पहली बार पैरालंपिक में खेलने का कोटा भी मिला गया।
कई गेम्स में हाथ अजमा चुकी हैं मोना
मोना बताती हैं कि ने जब मैंने पैरा-स्पोर्ट्स में अपना कॅरियर बनाने का सोचा तो शॉट पुट, डिस्कस, जेवलिन थ्रो और पावरलिफ्टिंग जैसे खेलों में हाथ आजमाया, प्रत्येक में राज्य-स्तरीय टूर्नामेंट में भी पहुंची। इसके बाद सिटिंग वॉलीबॉल में भी हाथ आजमाया और अपनी टीम बनाई इस दौरान उन्होंने स्टेट लेवल पर कई मेडल अपने नाम भी किए लेकिन टोक्यो पैरालंपिक खेलों में कुछ पाइंट की वजह से जगह नहीं मिलने की वजह से मैंने शूटिंग को चुना और अपने पहले पैरालंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीता।
पेरिस 2024 पैरालंपिक को बनाया था लक्ष्य
मोना पहले पैरालंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाई थी, लेकिन इसके बाद 2022 एशियाई पैरा खेलों और लीमा में 2023 डब्ल्यूएसपीएस चैंपियनशिप के जरिए पेरिस 2024 पैरालंपिक के लिए क्वालिफाई करने का लक्ष्य रखा था। हालांकि, वह पैरालंपिक के लिए क्वालिफाई करने से चूक गई थीं। इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित हुए डब्ल्यूएसपीएस विश्व कप 2024 में सफलता हासिल की। इसमें उन्होंने 250.7 का कुल स्कोर दर्ज करके स्वर्ण पदक जीतकर पेरिस पैरालंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई किया।
पति भी रह चुके हैं पैरा एथलीट
मोना के पति रविंद्र चौधरी ने भी सिटिंग वॉलीबॉल खेला है। दोनों 2017 में जयपुर के सवाई मानसिंह स्टेडियम में एक टूर्नामेंट के दौरान मिले थे। धीरे-धीरे दोनों की बातचीत बढ़ने लगी। फिर दोस्ती हो गई। फिर लगा कि हम एक-दूसरे के लिए ही बने हैं, लेकिन हम दोनों अलग-अलग जातियों से आते हैं। फिर हमने शादी करने की सोची क्योंकि हमारे विचार एक दूसरे से काफी हद तक मिलते-जुलते थे। फिर दोनों परिवारों की रजामंदी से शादी हुई। दोनों अब 2 बच्चों के माता-पिता
हैं।
गेम की वजह से महीनों से नहीं मिली बच्चों से
मोना ने बताया कि अपने गेम की वजह से वह बच्चों से पिछले 8 से 10 महीनों से नहीं मिल पाई। लगातार दिल्ली रहकर तैयारी कर रही थी। इसी बात का उन्हें सबसे ज्यादा दुख भी रहता है। मोना ने बताया कि अब वो फुरर्सत निकालकर सबसे पहले बच्चों के साथ समय बिताएंगी और खूब बातें करेंगी।
प्रधानमंत्री से अच्छी मुलाकात नहीं होने पर हैं निराश
मोना बताती हैं कि हाल ही में दिल्ली में पेरिस से लौटने के बाद पैरालंपिक भारतीय दल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। मोना बताती हैं कि वो प्रधानमंत्री मोदी की तबसे बहुत बडी प्रशंसक हैं, जब वो पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तब वह गुजरात में रहती थी। जब हम उनसे मिले पहुंचे हमारे लिए यह ऐतिहासिक क्षण था लेकिन वहां बहुत सारे एथलीट्स मौजूद थे। इन सबके बीच में उनसे शाबाशी लेने से चूक गई, जिससे मैं काफी निराश भी हुई। लेकिन मैंने भी अपने कोच से वादा किया हैं कि मैं एक दिन देश के लिए ऐसा काम करूंगी कि प्रधानमंत्री मोदी खुद मुझे मिलने बुलाएंगे।



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