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Success Story : केदारनाथ में घोड़े-खच्चर चलाने वाला बना IITian, पहाड़ से पहुंचा IIT मद्रास
Kedarnath Horse Handler Cracks IIT-JAM: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के बीरों देवल गांव से ताल्लुक रखने वाले अतुल कुमार ने यह साबित कर दिया है कि कठिन परिस्थितियां अगर किसी का हौसला तोड़ सकती हैं, तो उसी हौसले से उन्हें सफलता की ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया जा सकता है।
कभी केदारनाथ यात्रा मार्ग पर खच्चरों से तीर्थयात्रियों को ले जाने वाले अतुल अब IIT-मद्रास में गणित विषय से MSc करने जा रहे हैं। उन्होंने IIT-JAM 2025 परीक्षा में सफलता हासिल की है, जो देश के सबसे कठिन मास्टर्स एंट्रेंस एग्जाम में से एक मानी जाती है।

बचपन से संघर्षों में बीता जीवन
21 वर्षीय अतुल की जिंदगी बचपन से ही संघर्षों से भरी रही है। 20 13 की केदारनाथ त्रासदी में उनके परिवार का बहुत नुकसान हुआ था। उनके पिता प्रकाश कुमार, जो खच्चर चलाने का काम करते थे, बाढ़ के दौरान पांच दिनों तक लापता रहे। जब वह लौटे, तो हालात पूरी तरह बदल चुके थे। अगले साल एक दुर्घटना में उनकी टांग टूट गई, जिससे वे खच्चर चलाने लायक नहीं रहे।
ऐसे मुश्किल हालातों में अतुल ने बहुत कम उम्र से ही परिवार का सहारा बनना शुरू किया। हर साल यात्रा सीजन में वह सुबह तड़के उठकर खच्चरों को तैयार करते और तीर्थयात्रियों को लेकर 16 किलोमीटर की चढ़ाई तय करते थे। शाम को थककर लौटने के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। वह फर्श पर बैठकर, सिर्फ एक बल्ब की रोशनी में देर रात तक पढ़ाई करते थे।
काम और पढ़ाई के बीच किया संतुलन
अतुल बताते हैं कि उन्होंने और उनके भाई ने काम को इस तरह बांटा कि पढ़ाई भी हो सके। एक सुबह की यात्रा करता था और दूसरा बाद में। इस तरह दोनों को पढ़ाई के लिए समय मिल जाता था। उनके मुताबिक, "हम एक दिन में आमतौर पर एक चक्कर लगाते हैं, क्योंकि खच्चरों और हमारे लिए इससे ज्यादा संभव नहीं होता।"
इस बार उनकी दो खच्चरों श्रृष्टि और मिष्टी, बीमार हो गईं थीं, जिससे काम और भी मुश्किल हो गया था। अतुल कहते हैं, "हमारे पास खाने, रहने और खच्चरों की देखभाल के बाद इतना ही बचता है कि गुजारा हो सके।"
10 और 12वीं में जिले भर में दूसरा स्थान
संघर्षों के बीच अतुल ने कक्षा 10 और 12वीं में रुद्रप्रयाग जिले में दूसरा स्थान प्राप्त किया। राज्य स्तर पर भी उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया। उनकी मेहनत को पहचानते हुए एक संस्था ने उनकी स्नातक की पढ़ाई में आर्थिक मदद की। अब मास्टर डिग्री के लिए वह शिक्षकों और एजुकेशनल लोन की मदद लेना चाहते हैं। वह कहते हैं, "मैं अपने पिता से कुछ नहीं कह सकता, उन्होंने पहले ही बहुत कुछ सहा है।"
मुश्किलें नहीं करते हैं बयां
अतुल अपनी कठिनाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताते। उनका कहना है, "हमारे लिए यह कोई मुश्किल भरा जीवन नहीं है। यह सामान्य है। हम मेहनत करते हैं, ईमानदारी से कमाते हैं और सम्मान के साथ जीते हैं।" उनकी यह सरलता और संकल्प आज के युवाओं के लिए एक बड़ी सीख है।
पिता की आंखों में गर्व, लेकिन दिल में चिंता
अतुल के पिता प्रकाश कुमार कहते हैं, "वह अब एक अलग दुनिया में जा रहा है, लेकिन हमारी जिंदगी अब भी वैसी ही है। यह पूरी तरह उसकी मेहनत का नतीजा है।" अतुल का यह सफर न केवल उनके परिवार के लिए बल्कि पूरे गांव और राज्य के लिए प्रेरणादायक है।



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