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आजादी की जंग में इस मिठाई ने निभाई थी खास भूमिका, बनारस की इस मशहूर Tirangi Barfi को मिल चुका हैं GI टैग
Tiranga Barfi History: देश की आजादी में भूमिका निभाने कई फ्राइडम फाइटर, किताबों यहां तक की जेल के बारे में हमने सुना है। जिनके बिना देश की आजादी की कल्पना करना मुश्किल था। लेकिन इन सबके बीच में एक ऐसी भी मिठाई थी, जिसने देश की आजादी में मुख्य भूमिका निभाई थी।
इस मिठाई के नाम से अंग्रेज भी खौफ खाते थे। इसका नाम है तिंरगा बर्फी। बनारस की इस मशहूर मिठाई को कुछ समय पहले अपने अनूठे स्वाद की वजह से जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग फूड आइटम्स की लिस्ट में शामिल किया गया है। आइए सबसे पहले जानते हैं इस बर्फी और आजादी का कनेक्शन।

आजादी से है ये कनेक्शन
काजू और पिस्ता से खास तैयार होने वाली तिरंगी मतलब तीन रंग की मिठाई जो हमें राष्ट्रध्वज तिरंगे की याद दिलाता है। यह मिठाई केसरिया, सफेद और हरे रंग की होती है। काशी की इस तिरंगी बर्फी, जिसने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। क्योंकि, इस बर्फी का इस्तेमाल स्वतंत्रता सेनानी अपने गुप्त संदेंशों को पहुंचाने के लिए किये करते थे, जिससे ब्रिटिश को भनक भी नहीं लग सकें।
वे तिरंगा बर्फी को सीक्रेट कोड के तहत इस्तेमाल कर अपने गुप्त संदेशों को भारतीय लोगों के बीच तक पहुंचाते थे। 1942 में गांधी जी के करो या मरो के आह्वान के बाद क्रांतिकारियों ने खुफिया बैठकों और गुप्त सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए आजादी से मदन गोपाल गुप्ता द्वारा किया गया था। उस समय बनारस में ठठेरी बाजार में मशहूर राम भंडार नाम की मिठाई की दुकान होती थी और वे तब इसके निदेशक थे। उन्होंने इस मिठाई को अपनी दुकान में पहली बार बनाया था इसमें दूसरे क्रांतिकारी भी मौजूद थे। कहा जाता हैं कि जब भारतीयों को तिरंगा लेकर चलने पर रोक लगा दी गई थी तब क्रांतिकारी इसे हाथ में लेकर चलते थे।
मिला चुका है GI Tag
बनारस के राम भंडार पर आज भी यह मिठाई आजादी के दिनों वाले तिरंगा बर्फी का स्वाद बरकरार है। खास बात यह है कि इस तिरंगा बर्फी को तैयार करने में किसी रंग का नहीं बल्कि प्राकृतिक चीजों का प्रयोग होता है। काजू-पिस्ता से ये मिठाई तैयार होती है। इस बर्फी को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग मिल चुका है।



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