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हिंदू धर्म में कन्यादान का है विशेष महत्व, ऐसे शुरू हुआ ये रिवाज

हिंदू धर्म में शादियों का बड़ा महत्व है। हिंदू रीति रिवाजों में कई तरह की रस्में होती है। जिसका अपना अलग स्थान और महत्व होता है। खासकर जब एक लड़की की शादी होती है तो इन रस्मों रिवाज का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। हिंदू विवाह इन रस्मों के बिना पूरी नहीं हो सकती है। तेलपूजन से लेकर विदाई तक हर रस्म करने के पीछे कोई न कोई कारण छिपा होता है। इन शादी की रस्मों में सबसे अहम और जरूरी रस्म होती है कन्यादान। हिंदू शादी में इस रस्म को लेकर पिछले दिनों बवाल भी मच चुका है। लेकिन उन लोगों को इस रस्म के महत्व के मायनों के बारे में पता ही नहीं होता। आइए जानते हैं हिंदू विवाह में कन्यादान का क्या महत्व है, और इसे करने के पीछे क्या मान्यता है।
हिंदू विवाह में कन्यादान
हिंदू धर्म में कन्यादान को महादान के बराबर माना जाता है। ये शादी के सभी रीति रिवाजो में सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। कन्यादान को लोग लड़की को दान करना मानते हैं। लेकिन कन्यादान का ये अर्थ नहीं है। दरअसल हिंदू शादी में 22 चरण होते हैं। जिसमें कन्यादान को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस संस्कर में लड़की के पापा अपने बेटी को दान नहीं करते हैं, बल्किन वो अग्नि को साक्षी मानकर अपनी बेटी के गोत्र को दान करते हैं। जिसके बाद लड़की पिता का गोत्र छोड़कर अपने पति के गोत्र में शामिल होती है। इसलिए हिंदू विवाह में हर पिता के लिए कन्यादान महत्वपूर्ण माना जाता है। इतनी ही नहीं लड़की के पिता इस रिवाज के दौरान मंत्रोच्चारण के द्वारा लड़के से बेटी की खुशियों का ध्यान रखने का वचन मांगते हैं। और अपनी बेटी का हाथ लड़के के हाथ में देते हुए उसकी सुरक्षा, खुशियों की जिम्मेदारी लड़के के हाथ में सौंपते हैं। कन्यादान एक बेटी और पिता के बीच के रिश्ते को दिखाता है।
कन्यादान का महत्व
हिंदू धर्म में कन्यादान से बड़ा कोई और दान नहीं आता है। शास्त्रों में बताए गए विधि-विधान से कन्यादान होने पर लड़की के परिवार को भी इसका फल मिलता है। शास्त्रों के मुताबिक कन्यादान के बाद लड़की के लिए उसका घर पराया और पराया घर अपना हो जाता है।
कैसे किया जाता है कन्यादान
हिंदू धर्म के मुताबिक कन्यादान करने के लिए सबसे पहले लड़की की मां उसके हाथ में हल्दी लगाती है। जिसके बाद लड़की के पिता उसके हाथ में गुप्तदान धन और फूल रखकर संकल्प लेते हुए अपनी बेटी का हाथ लड़के के हाथ में सौंपते हैं। जिसके बाद लड़का लड़की के हाथ को पकड़कर उसकी जिम्मेदारी और खुशियों का संकल्प लेता है। इसके बाद लड़की के माता-पिता उसे पूरी तरह लड़के को सौंप देते हैं।
कन्यादान का इतिहास
पौऱाणिक कथाओं के मुताबिक सबसे पहले प्रजापति दक्ष ने अपनी बेटी की शादी में कन्यादान की प्रथा निभाई थी। प्रजापति ने अपनी 27 बेटियों ( जिनकों नक्षत्र कहा जाता है ) का कन्यादान करते हुए चंद्रमा को सौंपा था। ताकि सृष्टि का संचालन सही तरीके से हो सकें। तब से हिंदू विवाह में कन्यादान की रस्म शुरू हो गई।



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