Latest Updates
-
Akshaya Tritiya 2026: अक्षय तृतीया पर 10 रुपये के नमक का ये टोटका, रातों-रात बदल देगा आपकी किस्मत -
Akshaya Tritiya Wishes: घर की लक्ष्मी को इन खूबसूरत संदेशों के जरिए कहें 'हैप्पी अक्षय तृतीया' -
Akshaya Tritiya Vrat Katha: अक्षय तृतीया के दिन जरूर पढ़ें यह कथा, मिलेगा मां लक्ष्मी का आशीर्वाद -
Parshuram Jayanti 2026 Wishes: अधर्म पर विजय...इन संदेशों के साथ अपनों को दें परशुराम जयंती की शुभकामनाएं -
Akshaya Tritiya 2026 Wishes: सोने जैसी हो चमक आपकी...अक्षय तृतीया पर प्रियजनों को भेजें ये खास शुभकामना संदेश -
Akshaya Tritiya Wishes For Saasu Maa: सासु मां और ननद को भेजें ये प्यार भरे संदेश, रिश्तों में आएगी मिठास -
Aaj Ka Rashifal 19 April: अक्षय तृतीया और आयुष्मान योग का दुर्लभ संयोग, इन 2 राशियों की खुलेगी किस्मत -
Akshaya Tritiya 2026 Upay: अक्षय तृतीया पर करें ये 5 उपाय, मां लक्ष्मी की कृपा से सुख-संपत्ति में होगी वृद्धि -
World Liver Day 2026: हर साल 19 अप्रैल को क्यों मनाया जाता है विश्व लिवर दिवस? जानें इसका इतिहास, महत्व और थीम -
Nashik TCS Case: कौन है निदा खान? प्रेग्नेंसी के बीच गिरफ्तारी संभव या नहीं, जानें कानून क्या कहता है
Naga sadhu Vs Aghori : नागा साधु की तरह अघोरी भी रहते हैं निर्वस्त्र? जानें दोनों में क्या होता है अंतर?
Naga sadhu Vs Aghori : प्रयागराज के संगम में कुंभ मेले के अवसर पर नागा साधुओं का विशेष महत्व होता है। नागा साधु कुंभ मेले का अभिन्न हिस्सा होते हैं, जहां वे शाही स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। वहीं अक्सर होता है कि कई लोग इन नागा साधुओं को अघोरी बाबा समझ लेते हैं। हालांकि नागा साधु और अघोरी बाबा दोनों में कुछ समानताएं होती हैं, जैसे दोनों भगवान ही शिव के भक्त होते हैं, लेकिन उनके जीवन और साधना में काफी अंतर होता है।
नागा साधु कुंभ मेले में भाग लेते हैं, जबकि अघोरी बाबा का कुंभ में जाना आवश्यक नहीं होता है। नागा साधु निर्वस्त्र रहते हैं और सामाजिक अनुष्ठानों में सक्रिय होते हैं, जबकि अघोरी श्मशान में रहते हैं और मृत्यु से संबंधित साधना करते हैं, जिससे उनके जीवन की राह अलग होती है।

ऐसे में आइए जानते हैं कि नागा साधु और अघोरी बाबा में क्या अंतर है?
आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी स्थापना
नागा साधुओं की स्थापना का श्रेय आदि गुरु शंकराचार्य को दिया जाता है, 5वीं शताब्दी ईसापूर्व में सामाजिक और धार्मिक अशांति के समय इनका गठन किया गया था। नागा साधु बनने के लिए अखाड़े में एक गुरु बनाना अनिवार्य होता है। यह गुरु अखाड़े का मुखिया या कोई प्रतिष्ठित विद्वान साधु होता है। इन साधुओं का उद्देश्य धर्म की रक्षा करना और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना था। नागा साधु न केवल तपस्वी होते हैं, बल्कि वे शस्त्र धारण कर युद्ध में भी भाग लेते थे। साधुओं को अलग-अलग अखाड़ों में विभाजित किया गया, जहां उन्हें धार्मिक शिक्षा और युद्ध कौशल दोनों सिखाए गए।
इतिहास में नागा साधुओं की वीरता के कई उदाहरण मिलते हैं। जैसे, अहमद शाह अब्दाली के गोकुल पर आक्रमण के समय नागा साधुओं ने उसकी सेना का डटकर मुकाबला किया और गोकुल की रक्षा की।
नागा साधु बनना नहीं हैं आसान
नागा साधु बनने की प्रक्रिया कठिन और लंबी होती है, नागा संप्रदाय में दीक्षा लेने से पहले उन्हें अपना पिंडदान करना होता है, जो संसार के प्रति उनकी मृत्यु और सन्यास को दूसरा जीवन मानने का प्रतीक है। दीक्षा के बाद उन्हें 12 वर्षों तक अखंड ब्रह्मचर्य, ध्यान, योग, साधना, और धार्मिक कर्मकांड की शिक्षा लेनी होती है। ये जीवनभर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। कुंभ मेले के शाही स्नान में सबसे पहले गंगा स्नान का अधिकार नागा साधुओं को मिलता है।
अघोरी होते है शैव साधु
अघोरी अघोरपंथ के साधक और भगवान शिव के उपासक होते हैं। ये भगवान शिव की तरह ही श्मशान की नीरवता में वास करते हैं, जो मृत्यु के भय पर विजय का प्रतीक है। अघोर दर्शन के अनुसार, मृत्यु इस संसार का सबसे बड़ा डर है, और श्मशान वह स्थान है जहां अघोरी मृत्यु और जीवन के सत्य को समझते हैं। "अघोरी" का मतलब होता है कि जिनके लिए कुछ भी भयानक नहीं है, और वे समाज के पारंपरिक भय और सीमाओं से मुक्त रहते हैं।
पहनावे में होता है अंतर
नागा साधुओं की पहचान उनके दिगंबर स्वरूप से होती है, जिसका अर्थ है दिशाओं को ही वस्त्र मानना। ये साधु वस्त्र नहीं पहनते और शरीर पर धूनी की राख लपेटते हैं। त्रिशूल, तलवार, और शंख उनकी प्रमुख पहचान हैं। वहीं अघोरी भगवान शिव के भक्त होते हुए जानवरों की खाल से अपने तन का निचला हिस्सा ढकते हैं। यह उनकी तपस्या और शिव के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है।
दोनों ही रहते हैं समाज से दूर
अघोरी साधु हमेशा श्मशान में ही रहते हैं और बहुत कम ही कहीं नजर आते हैं। इसके विपरीत, नागा साधु कुंभ जैसे धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं और फिर हिमालय की ओर लौट जाते हैं। मान्यता है कि नागा साधु के दर्शन के बाद अघोरी के दर्शन करना भगवान शिव के दर्शन के समान होता है।
नागा और अघोरी खाते है ऐसा खाना
नागा और अघोरी दोनों ही नॉन-वेजिटेरियन होते हैं, हालांकि कुछ नागा संन्यासी शाकाहार भी अपनाते हैं। नागा साधु भिक्षा मांगकर अपना पेट भरते हैं, और वे अधिकतम 7 घरों से ही भिक्षा मांग सकते हैं, जिसमें जो भी मिलता है, उसी में संतुष्ट रहते हैं। दूसरी ओर, अघोरी संप्रदाय में कोई रोक नहीं होती; वे इंसानी मांस भी खा सकते हैं। कई डॉक्युमेंट्री और इंटरव्यू में अघोरियों ने स्वीकार किया कि वे श्मशान से अधजला मांस लेकर खाते हैं, जो उनकी साधना का हिस्सा है।



Click it and Unblock the Notifications











