Latest Updates
-
Teacher's Day 2026: 5 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है शिक्षक दिवस? जानिए क्या है इसका इतिहास और महत्व -
Teacher's Day 2026 Sanskrit Wishes: इन संस्कृत श्लोकोंं के जरिए गुरुजनों को भेजें शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं -
Teacher’s Day 2026 Wishes: गुरु का ज्ञान...इन संदेशों के साथ अपने टीचर्स को भेजें शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं -
Dahi Handi 2026: 5 या 6 सितंबर, कब है दही हांडी? जानें क्यों और कैसे मनाते हैं ये पर्व -
Janmashtami 2026: धन, प्रेम विवाह और संतान प्राप्ति के लिए जन्माष्टमी पर करें ये अचूक उपाय, पूरी होगी मनोकामना -
Happy Krishna Janmashtami 2026 Wishes: नंद के घर खुशियां आईं...जन्माष्टमी पर अपनों को भेजें ये शुभकामना संदेश -
Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर तुलसी तोड़ सकते हैं या नहीं? जानें क्या हैं धार्मिक नियम -
Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर घूमने के लिए बेस्ट हैं ये 7 जगहें, दिखेगा कृष्ण भक्ति का खास रंग -
Janmashtami 2026: कृष्ण जन्माष्टमी पर इन आसान तरीकों से सजाएं अपना पूजा घर, यहां देखें 10 डेकोरेशन आइडियाज -
World Coconut Day 2026: सूखा या ताजा नारियल, सेहत के लिए कौन सा ज्यादा फायदेमंद? जानें दोनों में अंतर
अयोध्या के चाचा शरीफ़ को पद्म श्री सम्मान, 25,000 लावारिस शवों का कर चुके हैं अंतिम संस्कार
71वें गणतंत्र दिवस के मौके पर शनिवार को हुए पद्मश्री पुरस्कारों की घोषणा से सम्मानित होने वाली हस्तियों में शुमार होने वाले अयोध्या के मोहम्मद शरीफ़ इन दिनों चर्चा में हैं। पिछले 27 सालों से लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर रहे मोहम्मद शरीफ़ को लोग प्यार से 'शरीफ़ चाचा' के नाम से बुलाते हैं। शरीफ़ चाचा कई वर्षों से अयोध्या में लावारिस शवों का दाह-संस्कार कर रहे हैं, उन्होंने अब तक 25,000 से ज्यादा शवों को दफ़नाया/दाह संस्कार किया है। वह अब तक कई हिन्दू व मुस्लिम लावारिस शवों को अंतिम संस्कार किया है।
पेशे से साइकिल मिस्त्री मोहम्मद शरीफ़ हर रोज लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए कब्रिस्तान और शमशान का चक्कर लगाया करते हैं।

फरवरी 1992 में शरीफ चाचा के बेटे की सुल्तानपुर में हत्या कर दी गई थी, जिसके बारे में उन्हें एक महीने बाद मालूम चला। उस समय रामजन्मभूमि का विवाद चल रहा था जिसके कारण 1992 में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई। बाद में, एक बोरे से रईस की लाश मिली। मोहम्मद शरीफ ने बस तभी से फैसला किया कि अब वे किसी की भी लावारिस लाश को सड़क पर नहीं सड़ने देंगे, अपने बेटे की इस घटना के बाद से ही शरीफ़ चाचा ने जिले में लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की ज़िम्मेदारी उठा ली थी। तब से वो आज तक ये नेकी का काम करते आ रहे हैं। शरीफ़ कहते हैं कि इसके चलते उन्हें कई बार आर्थिक तंगी का सामना भी करना पड़ता है लेकिन चंदा जुटाकर या दान में मिले पैसों से वो ये काम करना ज़ारी रख पाते हैं।



Click it and Unblock the Notifications