Latest Updates
-
Varalakshmi Vrat Katha: वरलक्ष्मी व्रत के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, धन से जुड़ी बाधाएं होंगी दूर -
Varalakshmi Vrat 2026 Wishes: मां लक्ष्मी का आशीर्वाद...वरलक्ष्मी व्रत पर प्रियजनों को भेजें ये शुभकामना संदेश -
Rakhi Gift Ideas For Sister: इस रक्षाबंधन बहन को दें ये 7 प्यार भरे तोहफे, देखते ही खुशी से झूम उठेगी -
World Mosquito Day 2026: मच्छरों के काटने से हो सकती हैं ये खतरनाक बीमारियां, बचाव के लिए अपनाएं ये घरेलू उपाय -
पुरूषों को स्पर्म काउंट बढ़ाने के लिए खानी चाहिए ये 7 चीजें, फर्टिलिटी में होगा सुधार -
घर में अचानक कॉकरोच निकलना शुभ या अशुभ? जानें ज्योतिष और वास्तु के संकेत -
40 की उम्र में भी नजर आएंगी 20 की, हेल्दी और ग्लोइंग स्किन के लिए डाइट में शामिल करें ये 7 फूड्स -
September Travel Destinations: सितंबर में घूमने के लिए बेस्ट हैं ये भारत की ये 7 खूबसूरत जगहें, मिलेगा यादगार -
World Photography Day 2026: क्यों मनाया जाता है विश्व फोटोग्राफी दिवस? जानें इस दिन का इतिहास, महत्व और थीम -
5 साल से तालाब में रह रहे इकबाल की मदद के लिए आगे आए अनंत अंबानी, इलाज के लिए मुंबई एयरलिफ्ट कराया
Freedom Fighters: नॉर्थ-ईस्ट इंडिया गुमनाम फ्रीडम फाइटर, जिनके जाबांजी किस्से आपके रौंगटे खड़े कर देंगे
स्वतंत्रता दिवस एक अवसर है, उन सभी सैनानियों को याद करने का, जिन्होंने देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए अपने प्राणों तक का बलिदान दे दिया। ऐसे लोग, जिन्होंने अपने लिए नहीं, बल्कि देश और आने वाली पीढ़ी के बेहतर भविष्य के लिए सोचा और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। हालांकि, जब भी स्वतंत्रता की बात की जाती है, तो उसमें कुछ बड़े नामों का ही जिक्र किया जाता है।
विशेष रूप से, इस चर्चा में पूर्वोत्तर के व्यक्तित्वों के योगदान को अक्सर छोड़ दिया जाता है। जबकि उनके प्रयासों ने अंग्रेजों ही कमर ही तोड़ कर रख दी थी। तो चलिए इस बार हम स्वतंत्रता दिवस के खास अवसर पर पूर्वोत्तर भारत के कुछ स्वतंत्रता सैनानियों के बारे में बता रहे हैं, जिनके बारे में हर किसी को जानना चाहिए-

कनकलता बरुआ
22 दिसंबर 1924 को असम में जन्मी कनकलता बरुआ को लोग बीरबाला और असम की रानी लक्ष्मीबाई भी कहते हैं। देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने महज 18 साल की उम्र में जीवन त्याग दिया। कनकलता बरुआ ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अपना नाम बनाया, जब वह केवल 17 वर्ष की उम्र में एक आत्म बलिदानी दस्ते में शामिल हुईं। हालांकि, इससे पहले उन्होंने आजाद हिंद फौज में शामिल होने के लिए आवेदन किया था, लेकिन नाबालिग होने के कारण खारिज कर दिया गया था। बता दें कि भारत छोडो आंदोलन के दौर में असम में 20 सितंबर, 1942 के दिन तेजपुर के एक स्थानीय पुलिस स्टेशन में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का फैसला किया गया था। कनकलता बरुआ ने इस जुलूस का नेतृत्व किया। वह अपने हाथों में तिरंगा थामे हुए आगे बढ़ रही थीं। थाना प्रभारी ने आगे बढ़ने पर जान से मारने की धमकी दी, लेकिन फिर भी कनकलता के कदम पीछे नहीं हटे। कनकलता जैसे ही तिरंगा लेकर आगे बढ़ीं, वैसे ही जुलूस पर गोलियों की बौछार कर दी गई। पहली गोली कनकलता की छाती पर लगी जिसे बोगी कछारी नाम के सिपाही ने चलाई थी। जिसके बाद, तिरंगे को उनके सहयोगी मुकुंद काकोटी ने उठा लिया, उन्हें भी गोली मार दी गई।

पाउना ब्रजबासी
1833 में जन्मे पाउना ब्रजबासी एक मणिपुरी सेनानायक थे। मणिपुर साम्राज्य की सेना में प्रवेश करने के बाद अपनी काबिलियत के दम पर वह 1891 तक मेजर के पद पर पहुंच गए। उसी वर्ष ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध एंग्लो-मणिपुर युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का प्रदर्शन किया। पाओना ने 23 अप्रैल 1891 को भारतीय इतिहास की सबसे भयंकर लड़ाई में से एक में अपने सैनिकों का बहादुरी से नेतृत्व किया। वह जानते थे कि इस युद्ध में उनके लिए लंबे समय तक टिक पाना संभव नहीं है, लेकिन फिर भी वह घबराए नहीं। यहां तक कि उन्होंने मृत्यु से पहले शत्रु पक्ष ने एक प्रस्ताव दिया था कि यदि वह उनकी तरफ से लड़ने को तैयार हों तो उन्हे जीवनदान दिया जा सकता है। लेकिन उन्होंने देशद्रोह से ज्यादा मौत को स्वीकार करना पसंद किया। पाओना ने अपनी टोपी के चारों ओर लिपटे कपड़े को उतार दिया और ब्रिटिश अधिकारी से उसका सिर काटने को कहा।

रानी गाइदिन्ल्यू
रानी गाइदिन्ल्यू का जन्म 26 जनवरी 1915 को मणिपुर के तमेंगलोंग जिले में हुआ था। उन्होंने महज 13 साल की उम्र में ही क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया था। उन्होंने 1927 में पूर्वोत्तर क्षेत्र की सुदूर पहाड़ियों से सभी जातीय नागा जनजातियों को एक स्पष्ट आह्वान जारी करते हुए कहा, "हम स्वतंत्र लोग हैं, गोरे लोगों को हम पर शासन नहीं करना चाहिए। उसी वर्ष वत अपने चचेरे भाई जादोनांग के हेराका आंदोलन से जुड़ गयी। उनके मार्गदर्शन में, यह आंदोलन बाद में एक राजनीतिक आंदोलन में बदल गया, जो अंग्रेजों को इस क्षेत्र से बाहर निकालने की मांग कर रहा था। उसने लोगों से करों का भुगतान न करने, अंग्रेजों के लिए काम नहीं करने का आग्रह किया और यहां तक कि औपनिवेशिक प्रशासन पर कई हमलों का नेतृत्व करने के लिए भूमिगत हो गई। 1932 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। जवाहरलाल नेहरू ने 1937 में शिलांग जेल में उनसे मुलाकात की और उन्हें रानी की उपाधि दी। भारत की आजादी के बाद 1947 में रिहा हुई, उन्होंने अपने लोगों के उत्थान के लिए काम करना जारी रखा।

हाइपौ जादोनांग
हाइपौ जादोनांग मणिपुर के समाज सुधारवादी, आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता थे, जिन्होंने 20 वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों के दौरान ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के चंगुल से नागा लोगों को मुक्त करने की मांग की थी। उन्होंने हेराका नामक आंदोलन भी चलाया। इसके अलावा उन्होंने एक सेना का निर्माण शुरू किया, जिसे उन्होंने 'रिफेन' कहा, जिसमें 500 पुरुष और महिलाएं शामिल हुईं। जादोनांग ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की स्तुति गाते हुए गीतों की रचना की, जो उनकी शिष्या रानी गैडिन्ल्यू ने अपने अनुयायियों को प्रदान की। 19 फरवरी 1931 को, उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों ने राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और बाद में झूठे हत्या के आरोप में उन्हें फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र महज 26 वर्ष थी।

यू तिरोत सिंह
1802 में जन्मे यू तिरोत सिंह मेघालय के खासी पहाड़ियों के एक क्षेत्र नोंगखलाव के मूल निवासी थे, जिन्होंने 1829-1833 के एंग्लो-खासी युद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई में खासियों का नेतृत्व किया था। दरअसल, ब्रह्मपुत्र घाटी और सूरमा घाटी को सुरक्षित करने के बाद, अंग्रेजों ने तिरोत से खासियों के निवास वाली पहाड़ियों के माध्यम से सड़क काटने की अनुमति मांगी। अंग्रेजों का प्रतिनिधित्व करते हुए डेविड स्कॉट ने तिरोत से कहा कि यदि अनुमति दी गई थी, तो उन्हें दुआर पर नियंत्रण दिया जाएगा और व्यापार की अनुकूल शर्तों का वादा किया गया था। तिरोत सिंह ने उस विचार का स्वागत किया। हालांकि, बाद में वह अपने वादे से मुकर गए और 4 अप्रैल 1929 को, उनकी सेना ने नोंगखला में तैनात ब्रिटिश गैरीसन पर हमला किया, जिसमें दो अधिकारी मारे गए। तिरोत और उसके लोगों ने छापामार युद्ध में चार साल तक अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। 1833 में, जब वह गोली लगने के बाद पहाड़ियों में छिप गए, तो उसके एक आदमी ने उसे धोखा दिया और जल्द ही ब्रिटिश सेना ने उसे पकड़ लिया। उन्हें ढाका भेज दिया गया, जहां 17 जुलाई 1835 को कैद में उनकी मृत्यु हो गई। तिरोत सिंह भारत मां के एक ऐसे सपूत थे जिन्होंने ब्रिटिशों के सामने कभी अपना सिर नहीं झुकाया।



Click it and Unblock the Notifications